बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों को ही उनके समर्थक 'विकास पुरुष' के तौर पर पेश करते हैं। इस आम चुनाव में दोनों अपने-अपने विकास मॉडल के साथ खडे हैं।
एक ओर जहां नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है और आम तौर पर युवा उसकी तारीफ करते दिख जाएंगे वहीं नीतीश के विकास मॉडल को भी मीडिया में काफी जगह मिली है।
मोदी के विकास मॉडल में जहां औद्योगीकरण और महिलाओं को सुरक्षा की चर्चा प्रमुखता से होती है तो वहीं नीतीश के मॉडल में सभी वर्गों के विकास का नारा है।
बिहार में मुजफ्फरपुर के बाबा साहब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के लिए इन दोनों मॉडलों पर बहस का मौका था। उन्होंने इसका बखूबी इस्तेमाल भी किया।
'मिट्टी खाकर जीएंगे?'
पूरी चर्चा में सर्वसम्मत तो नहीं मगर बहुमत तीन बातों पर स्पष्ट था। एक- राज्य में शिक्षा की स्थिति पर चिंता, दूसरी बात ये कि युवा गुजरात के विकास से प्रभावित थे और तीसरी ये कि नीतीश का पिछले 10 साल में किया गया काम दिख रहा है।
मगर कुछ युवाओं के तल्ख तेवर भी सामने आए। चर्चा में जब ए एन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के निदेशक डी एम दिवाकर ने बिहार में उपजाऊ जमीन, मीठे पानी और उर्वर मस्तिष्क का जिक्र किया तो सदानंद झा की नाराजगी फूट पडी।
सदानंद बोले, "बिहार में बेरोजगारी है। यहां जमीन तो अच्छी है मगर मैं क्या मिट्टी खाऊंगा? मिट्टी में उपजाने के लिए पानी चाहिए, खाद चाहिए। यहां सिंचाई की व्यवस्था नहीं है, उद्योग-धंधे नहीं हैं तो क्या हम मिट्टी खाकर जिंदा रहेंगे?"
दिवाकर उनकी इस बात से सहमत थे कि राज्य में खेती के विकास के उपाय नहीं हुए हैं।
सदानंद का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था कि राज्य में बिजली की स्थिति की बात होने लगी। इस मुद्दे पर उनका कहना था, "हम जिस गांव में रहते हैं वहां बिजली आज तक मयस्सर नहीं हुई है मगर बोर्ड जरूर लग गया कि इस गांव का विद्युतीकरण हो गया है। क्या खाली बोर्ड से बिजली मिल जाएगी गांव को?"
नीतीश से प्रभावित
मगर ऋचा नीतीश के काम से प्रभावित थीं। उन्होंने कहा, "राज्य का 15 साल में जो रूप बिगडा था, उसे नीतीश कुमार ने 10 साल में सुधारा है। सडकों पर जो काम हुआ है क्या हम उसे भूल सकते हैं? शिक्षा के मामले में मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य राज्य में इतने सारे लोगों को काम दिया गया है।"
उनका दावा था, "अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाए तो हम वो कर पाएंगे जो नरेंद्र मोदी तीन बार के शासन में नहीं कर सके।"
लगभग हर युवा शिक्षा की चर्चा जरूर कर रहा था। प्रकाश कुमार ने कहा, "बिहार में विकास की लहर की बात हो रही है मगर बिहार में विकास के लिए हुआ क्या है? शिक्षकों की बहाली 5000-6000 रुपए पर हो रही है। क्या इस वेतन पर गुजारा हो सकता है?"
प्रकाश ने शिक्षकों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "ऐसे शिक्षकों की बहाली हो रही है जिन्हें क से ज्ञ तक भी नहीं आता।"
शिक्षा पर चिंता
अविनाश सिंह का कहना था कि बिहार में लोग शिक्षक बनना नहीं चाह रहे हैं, जो कि ठीक नहीं है। अविनाश ने कहा, "हमारे यहां लोग शिक्षक बनना नहीं चाहते। अच्छे लोग बिहार से बाहर चले गए। वहां जाकर शिक्षित हुए मगर लौटे नहीं। वे 'अर्थ' से जुडे रहना ज्यादा पसंद करते हैं।"
चंद्रप्रकाश ने भी लोगों के बाहर जाने के मसले पर बात की। बोले, "हर साल हजारों छात्र बिहार से बाहर पढने के लिए जाते हैं। यहां पर कभी शिक्षक नहीं होगा तो कभी प्रयोगशाला नहीं होगी। अगर राज्य में ही अच्छी व्यवस्था हो तो हम बाहर क्यों जाएंगे? बेहतर भविष्य के लिए बाहर जाना मजबूरी है।"
मोहन लाल बीबीसी
इस चर्चा का संचालन किया बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा ने।
अनु सिंह ने भी कहा कि उन्हें राज्य में अगर विकल्प नहीं मिले तो वह बाहर जाना पसंद करेंगी। अनु का कहना था, "अगर मुझे दूसरे राज्यों में बेहतर विकल्प मिले तो मैं जरूर चली जाऊंगी।"
'शिलान्यास मॉडल'
मुकेश कुमार चाहते हैं कि बिहार में गुजरात मॉडल की अच्छी बातें ली जानी चाहिए। मुकेश ने कहा, "नीतीश कुमार के राज में हर गली-चौराहे पर शराब की दुकान खुल गई हैं। उसे रोकना होगा। गुजरात में औद्योगीकरण पर जोर है, उसे अपनाना चाहिए।"
अंत में रोशन कुमार ने एक चुभती हुई बात कही जिसने ज्यादातर युवाओं की टीस उजागर की। रोशन ने कहा, "यहां पर रोजगार मिलने में दो-तीन साल लग जाते हैं। ये मॉडल सिर्फ शिलान्यासों का मॉडल बन गया है। किसी जगह बोर्ड लग गया, शिलान्यास हो गया तो बस बात वहीं खत्म हो जाती है।"
हर राज्य की तरह यहां भी युवा अपने अधिकारों और शिक्षा को लेकर चिंतित भी हैं और जागरूक भी और उनके यही सरोकार शायद उनके मतदान में झलकने वाले हैं।