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...क्योंकि बच्चों की मौत कोई चुनावी मुद्दा नहीं

Fri, 02 May 2014 11:42 AM IST
पंकज प्रियदर्शी/बीबीसी संवाददाता, गंडामन धर्मासती गांव से लौटकर
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बिहार का सारण जिला इन दिनों हाई प्रोफाइल लोकसभा क्षेत्र बना हुआ है। यहां से राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद की पत्नी और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राबडी देवी चुनाव लड रही हैं। राबडी देवी को टक्कर दे रहे हैं भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राजीव प्रताप रूडी।
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इसी से सटा महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र भी है, जहां से राष्ट्रीय जनता दल प्रत्याशी प्रभुनाथ सिंह चुनाव लड रहे हैं और वो इस चुनाव को जीवन-मरण का प्रश्न मान रहे हैं।

जिला मुख्यालय छपरा से 35 किलोमीटर दूर मशरख के निकट धर्मासती गंडामन गांव आजकल शांत है। वैसे तो ये गांव महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र में पडता है, लेकिन यहां राजनीतिक हलचल नहीं दिखती।
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ये वही गांव हैं जिसने पिछले साल जुलाई में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी थी। वजह थी  मिड डे मील हादसा, जिनमें 23 मासूम बच्चों ने अपनी जान गंवा दी थी।

16 जुलाई 2013 को धर्मासती गंडामन गांव में ये हादसा हुआ था। इस मामले में  प्राध्यापिका मीना देवी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया है और वो इस समय जेल में हैं।

उस प्राइमरी स्कूल (सामुदायिक भवन) के सामने खुले प्रांगण में बच्चे खेल रहे हैं। आसपास निर्माणाधीन इमारत है। एक आंगनबाडी केंद्र भी बन गया है। नजदीक ही एक अस्पताल की इमारत भी बन कर खडी हो गई है। एक स्मारक भी आधा-अधूरा खडा है। जिस पर मारे गए बच्चों और उनके अभिभावकों के नाम खुदे हुए हैं।

सवाल
धर्मासती गंडामन गांव में हुए हादसे के बाद सरकारी वादों को दर्शाता बडा सा शिलालेख भी है। जिस पर सरकारी कार्यों की पूरी सूची लगी है। आपको सब कुछ पारदर्शी लगता है।

जिस सामुदायिक भवन में वो प्राइमरी स्कूल चलता था, उसके ठीक सामने ही एक बच्चे की कब्र सहसा आपको ठिठका देती है। आगे बढते ही एक और कब्र दिखती है और फिर उस गांव के नरेंद्र मिश्रा अपनी उंगलियों से दूर इशारा करते हैं, वहां सडक के उस पार बाकी बच्चों को दफनाया गया है। सोच कर ही रूह कांप जाती है।

जिस प्राइमरी स्कूल के बच्चों के साथ हादसा हुआ था, अब उस स्कूल वहां से हटाकर पास ही में स्थित मध्य विद्यालय में शिफ्ट कर दिया गया है। जहां एक कमरे में उस स्कूल के बच्चे पढते हैं।

जैसे ही आप उस मध्य विद्यालय में पहुंचते हैं, होश उड जाते हैं। स्कूल में कोई बच्चा नहीं दिखता। वहां मौजूद एक शिक्षक मुझसे कहते हैं- अभी तो बच्चे यहीं थे। खाना खाने गए हैं। मेरे दिमाग में एक बात कौंधती है, अगर बच्चे खाना खाने घर गए हैं, तो उस मिड डे मील का क्या, जिसके लिए सरकार कह रही है कि अब उसमें काफी बदलाव आ गया है और काफी एहतियात बरती जा रही है।

लेकिन मुझे अपने सवाल का जवाब नहीं मिलता। जिस एक कमरे में प्राइमरी स्कूल के उन बच्चों की पढाई होती है, वहां मुझे सिर्फ एक कुर्सी मिली। पूरा हॉल खाली पडा था। सवाल उठना स्वाभाविक था। उस स्कूल के टीचर का जवाब था- दरअसल प्राइमरी स्कूल में बेंच नहीं होता। बच्चे अपने घर से बोरा लेकर आते हैं और पढते हैं।

गिनती
सारण के जिलाधिकारी कुंदन कुमार से जब मैंने संपर्क किया, तो उन्हें इस मुद्दे पर मेरा सवाल पूछना नागवार गुजरा। उल्टे उन्होंने ये गिनाना शुरू कर दिया कि वहां क्या-क्या काम हुए हैं। जब मैंने स्कूल की हालत पर सवाल पूछे, तो उन्होंने कहा, "ऐसे विद्यालय बहुत सारे हैं, जहां आवश्यक संख्या में या पर्याप्त बेंच-कुर्सियां नहीं हैं। उम्मीद है कि इस बजट में हमें इसके लिए पैसा मिलेगा, जिससे बेंच-डेस्क खरीदा जा सके।"

लेकिन जो बच्चे उतनी मानसिक पीडा से गुजरे, जिन्होंने अपने दोस्तों को तडप-तडप कर मरते देखा, क्या उन्हें विशेष सुविधा की आवश्यकता नहीं? ऐसा गंडामन में बिल्कुल नहीं दिखता।

जब मैंने ये सवाल बिहार के शिक्षा मंत्री पीके शाही के समक्ष रखा, तो उनका कहना था, "सर्व शिक्षा अभियान के तहत जो चीजें आती हैं, उसमें फर्नीचर नहीं है। ऐसे स्कूलों को मेन्टेनेंस के लिए पांच हजार रुपए सालाना दिए जाते हैं। लेकिन इसमें फर्नीचर का प्रावधान नहीं है।"

हालांकि शिक्षा मंत्री ने बीबीसी को ये भी जानकारी दी कि वे राज्य की योजना से 120 करोड रुपए स्कूलों में फर्नीचर के लिए देने का फैसला किया है। इसमें खरीदने की प्रक्रिया तय की जा रही है और उम्मीद है कि अगले दो महीनों के अंदर सभी प्राइमरी स्कूलों को फर्नीचर मुहैया करा दिया जाएगा।

स्कूल नहीं आते कई बच्चे
लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है। प्राइमरी स्कूल में बच्चों की संख्या चौंकाने वाली है। मध्य विद्यालय के शिक्षक अब्दुल शकूर अंसारी ने बताया कि अब इस स्कूल में सिर्फ 12-14 बच्चे ही आते हैं। बाकी बच्चे नहीं आते। प्राइमरी स्कूल की एक शिक्षिका के जिम्मे अब ये सभी बच्चे हैं। लेकिन उस दिन वो शिक्षिका भी स्कूल से नदारद थीं।

पीडित परिवार के लोगों ने अब अपने बच्चों को उस स्कूल में भेजना बंद कर दिया है। मारे गए बच्चों के परिजन अब भी उस हादसे से उबर नहीं पाए हैं। लेकिन उन्हें पीडा इस बात की भी है कि सरकार ने दो लाख रुपए की मुआवजा राशि देकर जैसे इन परिवारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली है।

गंडामन धर्मासती के हरेंद्र मिश्रा के दो बच्चों की मौत जहरीला भोजन खाने से हो गई थी। उन बच्चों में एक की उम्र सात साल और दूसरे की उम्र नौ साल थी। हरेंद्र मिश्रा सरकार से काफी नाराज हैं। वे अब भी वो दिन भूले नहीं हैं जब वे अपने दोनों बच्चों को लेकर इलाज के लिए छपरा भागे थे। लेकिन जाते-जाते उनके दोनों बच्चों की मौत हो गई।

जैसे ही हरेंद्र मिश्रा ने अपने दोनों बच्चों के बारे में बताना शुरू किया, पास ही बैठी उनकी पत्नी फूट-फूट कर रो पडी। उन्हें चुप कराने की सारी कोशिशें नाकाम हो रही थी। हरेंद्र मिश्रा को आज भी डॉक्टर की वो बात याद है जिन्होंने उनसे कहा था कि अगर देर नहीं होती, तो बच्चे बच सकते थे।

बच्चों की क्या कीमत?
हरेंद्र मिश्रा ने कहा, "सरकार ने क्या किया। सिर्फ दो-दो लाख रुपए मुआवजा दे दिया। सरकार ने कई वादे किए थे। हर तरह का सहयोग देने की बात कही थी और नौकरी भी देने का वादा किया गया था। लेकिन कुछ नहीं हुआ। सिर्फ पैसे मिले हैं।"

उनकी पत्नी रोते हुए कहती हैं, "हम लोग सब कुछ खरीद कर खाते हैं। कोई सहारा नहीं है। खेती-बाडी नहीं है। सरकार को कोई सहारा देना चाहिए। सरकार ने दो-दो लाख रुपए दिए। लेकिन क्या मेरे बच्चे दो-दो लाख रुपए के थे।"

पीडित लोग इस बात से भी दुखी हैं कि उनके गांव को आदर्श गांव बनाने की तो बात की जा रही है, लेकिन जिन्होंने अपने बच्चे गंवाए, उन्हें सिर्फ मुआवजा देकर छोड दिया गया।

इसी गांव की पन्ना देवी ने उस दिन खाना बनाया था और अन्य बच्चों के साथ उनके बच्चों ने भी खाना खाया था। उनकी एक बच्ची तो पटना में हुए इलाज के बाद बच गई, लेकिन उनके दो बच्चों की मौत हो गई।

आज भी उन्हें वो दिन याद है कि कैसे जब खाना बनाते समय उन्होंने तेल डाला था, तो कडाही से कुछ ज्यादा ही धुंआ निकला था। जब उन्होंने ये बात स्कूल की प्रिंसिपल मीना देवी को बताई, तो उन्होंने ये कहकर उन्हें खाना बनाने को कह दिया कि कडाही ज्यादा गर्म हो गई है और उसकी चादर पतली है, इस कारण धुंआ ज्यादा निकला है।
'मैडम का निर्देश'

पीडित लोग इस बात से भी दुखी हैं कि उनके गांव को आदर्श गांव बनाने की तो बात की जा रही है, लेकिन जिन्होंने अपने बच्चे गंवाए, उन्हें सिर्फ मुआवजा देकर छोड दिया गया।

इसी गांव की पन्ना देवी ने उस दिन खाना बनाया था और अन्य बच्चों के साथ उनके बच्चों ने भी खाना खाया था। उनकी एक बच्ची तो पटना में हुए इलाज के बाद बच गई, लेकिन उनके दो बच्चों की मौत हो गई।

आज भी उन्हें वो दिन याद है कि कैसे जब खाना बनाते समय उन्होंने तेल डाला था, तो कडाही से कुछ ज्यादा ही धुंआ निकला था। जब उन्होंने ये बात स्कूल की प्रिंसिपल मीना देवी को बताई, तो उन्होंने ये कहकर उन्हें खाना बनाने को कह दिया कि कडाही ज्यादा गर्म हो गई है और उसकी चादर पतली है, इस कारण धुंआ ज्यादा निकला है।
'मैडम का निर्देश'
पन्ना देवी ने बीबीसी को बताया, "मैडम से हमने कहा था कि धुंआ ज्यादा निकला है। लेकिन मैडम ने कहा कि तसली की चादर पतली है और गर्म ज्यादा हो गया है, इसलिए धुंआ निकला है। आप खाना बनाओ।"

इसके बाद जैसे ही बच्चों ने खाना खाया, सब बीमार पडने लगे। इस हादसे में पन्ना देवी की एक बेटी और एक बेटे की मौत हो गई और एक बच्ची इलाज के बाद बच गई। लेकिन उसने स्कूल जाना छोड दिया है।
पन्ना देवी इस बात से काफी दुखी हैं कि गरीबी रेखा से नीचे रहने के बावजूद उन्हें इंदिरा आवास के तहत मकान नहीं दिया गया। साथ ही स्कूल में खाना बनाने का काम भी उनके हाथ से चला गया है।

वो कहती हैं, "नौकरी कहां मिली है। गांव के कई लोगों को इंदिरा आवास के तहत मकान मिला है। लेकिन मैं तो गरीबी रेखा से नीचे वाली हूं और पीडित भी हूं। सरकार ने वादा किया था कि वो पीडित परिवार के लोगों को नौकरी देगी। लेकिन कुछ नहीं हुआ। इतने लोग यहां आए और गए। लेकिन मुझे इंदिरा आवास के तहत मकान नहीं मिला। क्यों नहीं मिला।"

पन्ना देवी के पास कोई खेत नहीं है। वो दूसरों के खेतों में काम करके या फिर बटाई का काम लेकर अपना गुजारा करती हैं।
'दलालों का बोलबाला'

गांव के सुरेंद्र प्रसाद की 10 साल की बेटी ममता कुमारी की भी जहरीला खाना खाने के बाद मौत हो गई थी। उनकी नाराजगी सरकार से कम निचले स्तर के कर्मचारियों से ज्यादा है।

वो कहते हैं, "यहां वादे कई हुए थे। लेकिन सरकार में कोई गलती नहीं है। लेकिन यहां लूटखोरी मची हुई है। ब्लॉक स्टाफ लूट लेते हैं और दलालों का काम होता है। पीडित परिवारों का नहीं। पीडित परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।"

सुरेंद्र प्रसाद को इसकी भी परेशानी है कि उनकी पत्नी अब भी उस हादसे से उबर नहीं पाई हैं और उसका असर उनकी मानसिक स्थिति पर पडा है। उन्होंने बताया कि सरकार ने उन लोगों से कहा था कि पटना से डॉक्टर आकर उनकी जांच करेंगे और चिकित्सा सहायता दी जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसी हालत सिर्फ उनकी पत्नी की ही नहीं, बल्कि कई मां-बाप की है, जिनके बच्चों की इस हादसे में मौत हो गई है।

लेकिन सारण के जिलाधिकारी ये बात मानने को तैयार नहीं। वो कहते हैं कि सरकार ने कई काम किए, चिकित्सा सुविधा दी, स्कूल बनवाए, सडकें बनवाईं, बिजली दी। जब उन्होंने पीडित परिवार को इंदिरा आवास देने का जिक्र किया, तो मैंने पन्ना देवी का मामला उठाया।
क्या करेगी सरकार?

इस पर जिलाधिकारी कुंदन कुमार का कहना था, "वादा करना प्रशासन का काम नहीं। इंदिरा आवास के लिए जो प्रक्रिया तय की गई थी, उसके तहत ही लोगों को मकान दिए गए हैं। उस गांव के 65 लोगों को इंदिरा आवास मिला है।"

जब मैंने ये कहा कि लेकिन कई पीडित परिवारों को ये नहीं मिला है और लाभ दूसरे उठा रहे हैं, तो डीएम साहब भडक उठे। उन्होंने मुझसे नाम पूछा, जब मैंने पन्ना देवी का नाम बताया, तो कहने लगे आप मुझसे पूछताछ कर रहे हैं और मैं इसका जवाब नहीं दे सकता।

डीएम साहब जवाब नहीं देना चाहते। पीडित परिवार दलालों और कर्मचारियों की लूट के आरोप लगा रहा है। चुनाव का समय है। नेता जनता से संपर्क कर रहे हैं। बडे-बडे वादे किए जा रहे हैं।

लेकिन पीडित परिवार की शिकायतें कोई मुद्दा नहीं। अपने दो बच्चे गंवाने वाले हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, "क्या हो रहा है, क्या कर रहे हैं, क्या करेंगे। क्या सरकार करेगी, क्या नहीं करेगी। हम लोग तो अपने बच्चों की याद में मर रहे हैं। अब क्या करेगी सरकार, क्या करेंगे सांसद और क्या करेंगे विधायक।"
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