सहरसा जिले के बाढ़ पीड़ितों के लिए इस साल का दशहरा बेहद दर्दनाक और फीका साबित हो रहा है। पश्चिमी कोसी तटबंध के टूटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने सैकड़ों परिवारों को अपने गांव छोड़कर तटबंध और सड़कों के किनारे शरण लेने पर मजबूर कर दिया। गंडौल, ब्रह्मपुर, मोहनपुर, रही टोल, पुनाछ, जलई, मनोवर, खोरा बर्तन, शंकरथुआ और घोंघेपुर जैसे कई गांव अब भी बाढ़ के पानी में डूबे हुए हैं, जिससे लोग अपने घरों में दुर्गापूजा का पारंपरिक आयोजन नहीं कर सके।
प्रकृति की मार से फीका पड़ा दशहरा उत्सव
जानकारी के मुताबिक, 28 सितंबर की रात पश्चिमी कोसी तटबंध के टूटने से जो बाढ़ आई, उसने इन गांवों के दशहरे की खुशियों को बहा दिया। घरों में कलश स्थापना, दुर्गासप्तशती का पाठ और देवी के समक्ष पूजा-अर्चना करने जैसी परंपराओं को निभाने में असमर्थ रहे बाढ़ पीड़ित इस बार सड़कों और तटबंधों पर शरण लिए हुए हैं। उनके गांवों में अब तक पानी भरा हुआ है और अगर बारिश न हुई तो भी इस पानी के सूखने में कम से कम 15 दिन और लगेंगे।
बच्चों का उत्साह भी छिना
पुनाछ गांव के सड़क किनारे ही दुर्गापूजा का आयोजन किया गया है, जहां देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई है। महिलाएं और पुजारी नियमित रूप से पूजा कर रहे हैं, लेकिन चेहरों पर बाढ़ का दर्द साफ झलक रहा है। बच्चों के लिए इस बार न तो नए कपड़े हैं और न ही मेले का उत्साह है। वे देवी की प्रतिमा देखकर उदास हैं, क्योंकि इस बार उनका दशहरा फीका हो गया है।
धार्मिक परंपराओं में आई बाधा
बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि वे हर साल दशहरा के दौरान कलश स्थापना करते थे, नियमपूर्वक पूजा-अर्चना करते थे। लेकिन इस बार सभी परंपराएं टूट गईं। मोहनपुर अमाही की सावित्री देवी ने कहा कि हमारे घर के गोंसाई (गृहदेवता) भी बाढ़ के पानी में डूब गए हैं। हर साल कलश स्थापना कर पूजा करती थी, लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हो सका।
राहत शिविरों में भोजन की तकलीफ
बाढ़ पीड़ितों को राहत शिविरों में मिलने वाले भोजन के साथ समझौता करना पड़ रहा है। शंकरथुआ की वंदना कुमारी ने कहा कि दशहरा के दौरान नौ दिनों तक मैं बिना लहसुन-प्याज के भोजन करती थी। इस बार शिविर में जो खाना मिल रहा है, वही खाना पड़ रहा है। मोहनपुर के सत्यनारायण प्रसाद ने भी इस बार के दशहरे को निराशाजनक बताते हुए कहा कि बाढ़ ने उनके धार्मिक अनुशासन को पूरी तरह बाधित कर दिया है।
तटबंध पर शरण लिए हुए लोग
गौरतलब है कि जो लोग तटबंध और सड़कों पर शरण लिए हुए हैं, वे देवी दुर्गा के दर्शन और पूजा तो कर रहे हैं। लेकिन बाढ़ के बाद की स्थिति ने उनके उत्सव को फीका कर दिया है। वे न अपने घरों में पूजा कर पा रहे हैं और न ही पारंपरिक अनुष्ठानों का पालन कर पा रहे हैं। बाढ़ के पानी से अब तक न निकले गांवों ने उनके दशहरे के उत्साह को पूरी तरह से मिटा दिया है।