बाढ़ के कारण बिहार में त्रासदी एक बार फिर मची हुई है।
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नेपाल से बिहार आने वाली बाढ़ की समस्या कितनी पुरानी है?
नेपाल ऊपरी हिस्सा है और वहां जब भी उसकी जमीन-नदी की क्षमता से अधिक बारिश होगी तो वह नीचे बिहार की ओर पानी भेजेगा ही। यह समस्या आज की नहीं। कितनी पुरानी है, इसका रिकॉर्ड मिलना मुश्किल है। बिहार की नदियों और बाढ़ के सबसे चर्चित विशेषज्ञ, जल वैज्ञानिक दिनेश मिश्र बताते हैं- “अंग्रेज जब से आए, तब से परेशान थे। 1779 में नक्शा बनवाया था, तभी कोसी और इसकी बाढ़ के बारे में कागज पर जानकारी आई थी। हालत यह थी अंग्रेज भी इस इलाके से बाढ़ के कारण ही राजस्व की उम्मीद नहीं रखते थे। नेपाल की सप्तकोशी नदी बिहार आकर कोसी बनती है। कहा जाता है कि कभी यह मौजूदा बांग्लादेश के एक हिस्से से गुजरती थी, क्योंकि वहां बहुत बालू है जो कोसी के बगैर नहीं हो सकता। बाद में कोसी पूर्णिया के पूरब से बहने लगी। अब यह सुपौल से सहरसा होकर बहती है।"
उस जमाने की सरकार ने क्या-क्यों निकाला रास्ता?
अंग्रेजों को भारत में विद्रोह की आशंका दिख रही थी तो दुरुह क्षेत्रों में फौज को तत्काल पहुंचाने के लिए उन्हें नदियों को बांधने की जरूरत दिखाई दी। कोसी नदी को उत्तर-दक्षिण की तरफ से पहली बार 1854 में बांधे जाने का प्रस्ताव आया। नदी-बाढ़ विशेषज्ञ दिनेश मिश्र कहते हैं- "पहली बार 1869 में जब कोसी को बांधा गया तो इतना जलजमाव हुआ कि हंगामा मच गया। बांध को तोड़ा गया। फिर, हंगामा संभालने के बाद 1891 में बांधने की तैयारी हुई तो उस साल मई में ही बाढ़ आ गई। अंग्रेजों के समय तो इसपर बहुत बार बहस हुई, बात बनी या खत्म हुई। इंजीनियर विलियम विलकॉक्स ने कोलकाता विवि में 1930 में लेक्चर में भी जिक्र किया, हालांकि उन्होंने दामोदर नदी पर ज्यादा फोकस किया। जहां तक स्व-शासन की बात है तो आजादी के आसपास भारत के शीर्ष नेतृत्व को यह जरूरी लगा। आजादी से पहले 1947 में ही दरभंगा के निर्मली में बैठक हुई थी। तब आसपास के गांवों से 60 हजार लोग आए थे। नेपाल में बांध बनाने के लिए उसकी सहमति और लागत पर विमर्श हुआ। लागत 177 करोड़ निकली तो हाथ-पांव फूलने लगे। कोसी में जलाशय सहित तटबंध बनाने का फैसला हुआ, लेकिन फिर 37 करोड़ में सिर्फ तटबंध बनने की बात हुई। तभी यह बात भी आई कि तटबंध बनाना सुरक्षित नहीं होगा। यह सब जमीन पर उतरता, इससे पहले 1954 में जबरदस्त बाढ़ आई। तब तीन इंजीनियर्स की कमेटी बनी। उधर, भारत सरकार ने दो अधिकारियों को 'ह्वांग हो' पर तटबंध की उपयोगिता-सफलता को समझने के लिए चीन भेज दिया। चूंकि उनके चीन जाने से पहले ही संसद में इस तटबंध की घोषणा हो चुकी थी, इसलिए अधिकारियों ने लौटकर इसके लिए अनुशंसा कर दी। इन्हीं अधिकारियों ने बाद में अपनी किताब में लिखा कि ह्वांग हो नदी के तटबंध ईसा पूर्व के बने थे और बीजिंग विवि में मिले दस्तावेजों के अनुसार 1500 बार टूट चुके थे। उनमें 100 बार ऐसी दरार बनी कि वापस तटबंध के अंदर नहीं लाया जा सका। जो धाराएं बनीं, उसी पर आगे जाकर तटबंध बनाए गए। नौ धाराओं पर 18 तटबंध बनाए गए। मतलब, साफ है कि तटबंध कोई रास्ता नहीं था लेकिन उसी पर सरकार चल पड़ी थी।"
बिहार में इस बार 56 साल बाद इतना पानी नेपाल से आया है।
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इस जमाने की बात करने से पहले याद करें कुसहा त्रासदी
बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी नदी ने तटबंधों के टूटने पर 1981, 1984, 1987 आदि में बहुत बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ था। 1987 की बाढ़ में तो बेगूसराय का बड़ा हिस्सा भी डूब गया था, जबकि सरकारें इकलौते औद्योगिक जिले को बचाने के लिए दूसरी तरफ के बांधों को तोड़ने के लिए भी चर्चित रही थीं। इसके बाद 1992 की बाढ़ की चर्चा होती और उसके बाद सीधे सबसे बड़ी कुसहा त्रासदी की। 18 अगस्त, 2008 को कोसी का पूर्वी तटबंध नेपाल के कुसहा गांव के पास टूट गया था। इससे सुपौल का वीरपुर अनुमंडल सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। सुपौल के बाद सबसे ज्यादा मधेपुरा, सहरसा, पूर्णिया, अररिया, कटिहार आदि जिले बुरी तरह प्रभावित हुए थे। 500 से ज्यादा बाढ़ के पानी में समा गए। कोसी की 15 किलोमीटर चौड़ी एक नई धारा बन गई और वह पानी जिधर से गुजरा- तबाही मचाता गया। तब 25 लाख लोग इस नई धारा के पानी की चपेट में लंबे समय तक प्रभावित रहे थे।
बिहार के एक बड़े हिस्से की अर्थव्यवस्था पर प्रहार करती है बाढ़
बिहार के सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी, दरभंगा, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर, किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार, खगड़िया आदि जिलों की अर्थव्यवस्था पर बाढ़ हर साल करारा प्रहार करती है। अंग्रेज कोसी की बाढ़ के कारण सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, कटिहार, किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार, खगड़िया आदि के हिस्सों को राजस्व के मामले में कमजोर मानते थे। तब इनमें से कई जिले नहीं थे, बल्कि किसी-किसी जिले का हिस्सा थे। आज यह जिले हैं, लेकिन इनकी अर्थव्यवस्था आज भी बाढ़ के कारण प्रभावित रहती है। इन इलाकों के मजदूर भारी संख्या में परदेस कमाने के लिए चले जाते हैं। जो रहते हैं, वह बेहद बुरी स्थिति में काम चलाते हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिले तो खाना मुश्किल वाली स्थिति भी रहती है। यह मकई और धान का क्षेत्र है। मक्के की फसल सबसे ज्यादा इसी इलाके में होती है। फसल का बड़ा हिस्सा नदियों के पेट (नदी की धारा हटने से खाली जमीन) में भी उपजाया जाता है। जिनके पास अपनी जमीन नहीं है, वह पूरी तरह भगवान भरोसे होकर नदी की जमीन पर खेती करते हैं। इस बार की बाढ़ में भी मक्के की फसल बुरी तरह से बर्बाद हुई है। धान की भी बर्बादी हुई है। खगड़िया तक इसका असर है। अभी ज्यादातर जिलों में बाढ़ से हुए फसलों के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है, क्योंकि कई बार जल्दी पानी निकलने पर बहुत सारा फसल वापस उठ भी जाता है। वैसे, फिलहाल नुकसान तो साफ दिख रहा है। उदाहरण के लिए दरभंगा से जानकारी मिल रही है कि बाढ़ से कुल 7000 हेक्टेयर में लगाई गई फसल को नुकसान हुआ है।
बिहार में बाढ़ की त्रासदी दिखा रही यह तस्वीर। इसमें कुछ ही मकान बच रहे हैं।
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समाधान को लेकर कहां हो रही चूक, यह भी जानना चाहिए
नेपाल में अरसे से बांध बनाने की बात हो रही है, करीब 800 फीट ऊंचा। इस बांध को नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र में ही बनाने की बात हो रही है, ताकि पानी वहीं बांध दिया जाए। लेकिन नेपाल की शर्त है कि भारत को अगर ऐसा करना है तो वहां के 60 हजार लोगों के पुनर्वास की ठोस पहल करे। मतलब, जीविका का स्रोत दे। नदी विशेषज्ञ दिनेश मिश्र कहते हैं कि "सरकार के लिए इतनी कीमत देना आसान नहीं है।" इधर बिहार के उप मुख्यमंत्री नेपाल की इसी शर्त को देखते हुए अब बिहार में ही बांध बनाने की मांग लेकर दिल्ली में हैं। लेकिन, क्या बांध बनाना ही समाधान है? इस सवाल के जवाब में दिनेश मिश्र कहते हैं कि "नदी में हर साल गाद की परत बनती है। इन परतों के कारण नदी का लेवल ऊंचा हो गया है। इसलिए, सबसे पहले अंग्रेजों के समय का रिकॉर्ड निकालकर देखना होगा कि नदी की जमीन का वास्तविक लेवल उस समय क्या था? अंग्रेजों की बनाई यह रिपोर्ट केंद्रीय जल आयोग और/या रूड़की विश्वविद्यालय में होगी। नदियों से गाद हटाकर उस लेवल तक लाना एक बड़ा समाधान है, क्योंकि बांध बना देने से टूटने का खतरा तो बना ही रहेगा। इससे बेहतर पानी को नदी में रखना और उसका वैकल्पिक ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करना है।" नदियों को जोड़ना एक समाधान है या नहीं, इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं- "अपने राज्य की नदियों पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं तो दूसरे राज्यों से समन्वय बनाना और फिर अलग-अलग स्वभाव की नदियों के बीच पानी की धारा का समन्वय बहुत ही वैज्ञानिक काम होगा। अगर उस स्तर की तैयारी और ईमानदार मेहनत नहीं हुई तो बाढ़ को भटकाने से और ज्यादा भयंकर परिणाम आ सकते हैं।"