लोकसभा चुनाव में तेजस्वी यादव के साथ 200 जनसभाओं का रिकॉर्ड बनाने वाले विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी के पिता की हत्या के बाद कयासबाजी में कुछ मीडिया संस्थान ('अमर उजाला' नहीं) उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से राज्यसभा भेजते नजर आए। खैर, वह होना नहीं था। क्योंकि, 'अमर उजाला' ने काफी पहले बता दिया था कि लोकसभा चुनाव के समय ही बिहार विधानसभा चुनाव के लिए राजग के दलों में लगभग डील हो गई है। लोकसभा चुनाव परिणाम का इस डील पर असर पड़ना था और अब वह पड़ता हुआ दिख रहा है। इसलिए, बुधवार को राज्यसभा के लिए जब पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने नामांकन का पर्चा दाखिल किया तो एकबारगी मुकेश सहनी की चर्चा चल निकली। सवाल उठ रहा कि कहीं मुकेश सहनी जैसा हाल तो उपेंद्र कुशवाहा का नहीं कर देगी भारतीय जनता पार्टी? यह हम नहीं कह रहे, फिज़ा में सवाल है। नई भाजपा को समझने वाले इस आशंका से इनकार नहीं कर रहे।
क्या हुआ था मुकेश सहनी के साथ, यह याद करें
मुकेश सहनी बिहार में तब राजग के साथ थे। राजग में पहले तो उन्हें उनकी पार्टी के लिए सीटें नहीं दी जा रही थीं और जब दी गईं तो भाजपा वाले प्रत्याशियों के साथ। मुकेश सहनी को भाजपा ने बिहार में मंत्री भी बनाया, लेकिन विधान परिषद् की ऐसी सीट दी कि कार्यकाल बीच में ही खत्म हो जाए। इधर उनका कार्यकाल खत्म हुआ और मंत्रीपद चला गया। दूसरी ओर उनके विधायक पूरी पार्टी को खत्म करते हुए भाजपा में चले गए। बहुत पुरानी नहीं, यह दो साल पहले की ही बात है। इसे सहनी ने छल-प्रपंच माना और इस लोकसभा चुनाव के पहले उन्होंने थक-हारकर राष्ट्रीय जनता दल की शरण ली। उन्हें लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारने का मौका तो मिला, लेकिन जीत नहीं। एक तरह से राजनीतिक वजूद के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं मुकेश सहनी।
क्या हुआ है उपेंद्र कुशवाहा के साथ, आगे क्या संभव
लोकसभा चुनाव में अपनी पसंदीदा सीट काराकाट के लिए उपेंद्र कुशवाहा अड़े रहे तो उन्हें वह सीट दे दी गई। इसके बाद भाजपा में रहते हुए भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह ने काराकाट से निर्दलीय नामांकन कर दिया। उपेंद्र कुशवाहा के लिए यह सीट जितनी आसान हो सकती थी, उतनी ही मुश्किल रही। अंत में भाजपा ने पवन सिंह को पार्टी से निष्कासित करने की घोषणा की तो उपेंद्र कुशवाहा ने खुशी जताई, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। काराकाट सीट पर उपेंद्र कुशवाहा तीसरे नंबर पर उतर गए। इसके बाद भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में भेजने का भरोसा दिलाया और उनके नाम की घोषणा भी काफी पहले कर दी, लेकिन नामांकन से रोके भी रखा। नामांकन भरने की अंतिम तिथि से एक दिन पहले भाजपा ने अपनी पार्टी से मनन कुमार मिश्रा को चुनाव में उतारा। जैसे ही मनन कुमार मिश्रा का नाम आया, उपेंद्र कुशवाहा आशंकित हो गए कि उन्हें मीसा भारती के इस्तीफे से खाली हुई सीट मिलेगी या विवेक ठाकुर वाली। बुधवार को नामांकन दाखिल हुआ और उन्हें विवेक ठाकुर वाली सीट पर नामांकन करना पड़ा। इस सीट पर करीब दो साल का कार्यकाल शेष है, जबकि मीसा भारती वाली सीट पर करीब चार साल। मतलब, केंद्रीय मंत्री का अनुभव रखने और राजग में कुशवाहा जाति की अहम भागीदारी के बावजूद कहीं-न-कहीं उपेंद्र कुशवाहा के साथ खेल तो हुआ ही।
कहीं इतिहास को देखकर तो भाजपा ऐसा नहीं कर रही है?
2019 के लोकसभा चुनाव से करीब एक साल पहले उपेंद्र कुशवाहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल के सदस्य थे। मानव संसाधन राज्य मंत्री की हैसियत थी। लेकिन, जिस तरह पशुपति कुमार पारस ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था, लगभग उसी तरह उपेंद्र कुशवाहा ने भी मोदी मंत्रिमंडल से खुद को बाहर कर लिया था। पारस चुनाव के ठीक पहले निकले, कुशवाहा ठीकठाक समय रहते निकल गए थे। तब कुशवाहा की बिहार के सीएम नीतीश कुमार से पटरी नहीं बैठ रही थी। फिर वह वक्त लौटकर आया, जिसमें उपेंद्र कुशवाहा वापस नीतीश कुमार के करीब हो गए। कुशवाहा को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाईटेड में ठीकठाक जगह मिल गई। लेकिन, जब नीतीश के दूसरे करीबी राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने पार्टी की कमान संभाली तो कुशवाहा को एक समय खुद पार्टी छोड़नी पड़ी। वह वापस राजग की ओर मुखातिब हुए। तब नीतीश कुमार महागठबंधन में थे।
कुछ सोच रहे या विधानसभा के लिए मिले भरोसे पर मुस्करा रहे?
पिछले साल के अंत में जदयू की कमान जब नीतीश ने खुद संभाली तो एक महीने के अंदर जदयू ने भाजपा के साथ वापसी की। लोकसभा चुनाव की तैयारियों के बीच जदयू की राजग में दोबारा एंट्री से उपेंद्र कुशवाहा को झटका लगा। वह अपनी पार्टी के लिए कम-से-कम तीन सीटें सोचकर बैठे थे, लेकिन राजग का बड़ा हिस्सा भाजपा-जदयू में बंट जाने के कारण उन्हें सिर्फ अपने लिए काराकाट सीट मिली। तब भी वह मुस्कराते हुए उतरे। फिर हारने के बाद राज्यसभा के लिए नाम आने पर भी मुस्कराते रहे। अब राज्यसभा में दो साल के लिए मौका मिलने पर भी मुस्कराहट के साथ नामांकन किया। अब देखना है कि उनकी मुस्कराहट में कुछ बड़ी योजना छिपी है या वह विधानसभा चुनाव के लिए मिले भरोसे के कारण सबकुछ सह रहे हैं।