बिहार चुनावों में लालू-नीतीश के महागठबंधन के लिए सबसे बड़ी टेंशन बने एमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी की एक घोषणा ने उन्हें कुछ राहत दे दी है। बिहार चुनाव लड़ने की घोषणा करने वाले ओवैसी ने कहा है कि वह फिलहाल छह सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारेंगे।
ओवैसी ने बिहार के सीमांचल में ही अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारने की बात कही है। माना जा रहा है कि किशनगंज जिले की चार सीटों के अलावा नजदीकी अररिया की कुछ सीटों पर भी ओवैसी अपने उम्मीदवार उतार सकते हैं।
सीमांचल के ये इलाके मुस्लिम बहुल आबादी वाले माने जाते हैं। ऐसे में मात्र छह सीटों से ही चुनाव लड़ने की घोषणा ने लालू-नीतीश और कांग्रेस के महागठबंधन को काफी राहत दे दी है।
पूर्व में की थी 24 सीटों पर लड़ने की घोषणा
क्योंकि पूर्व में ओवैसी ने इस बात के संकेत दिए थे कि वह सीमांचल की मुस्लिम बहुल दो दर्जन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार सकते हैं। ऐसे में उनके इस कदम का सबसे ज्यादा नुकसान राजद और जेडीयू को ही उठाना पड़ता।
इन सीटों पर भाजपा की कभी कोई खास उपस्थिति नहीं रही है, इन सीटों पर जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं। ऐेसे में अगर सीमांचल की इन सीटों पर ओवैसी अपने उम्मीदवार उतारते तो बेशक उन्हें जीत न नसीबत होती लेकिन वह इन दलों के काफी वोट जरूर काट देते।
और ऐसी स्थिति में जब बिहार चुनावों में हार जीत का अंतर बहुत कम रहने की संभावना जताई जा रही है तब लालू-नितीश को इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता था। जबकि भाजपा और अन्य विपक्षी दल इसका फायदा उठाने की कोशिश कर सकते थे।
ओवैसी की एंट्री से टेंशन में था महागठबंधन
महागठबंधन की दूसरी दिक्कत ये भी थी कि अगर ओवैसी सीमांचल की 24 सीटों पर चुनाव लड़ते तो उनका दायरा ज्यादा फैलता और इससे मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की आंशका भी बनी रहती।
अब जब ओवैसी ने मात्र 6 सीटों पर ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है तब माना जा रहा है कि वो खुद को इन्हीं सीटों तक सीमित रख सकते हैं जिससे इन छह सीटों पर जीत पक्की कर सकें। ऐसे में ओवैसी के इस कदम ने पहले से ही विभिन्न चुनौतियों से जूझ रहे महागठबंधन के लिए राहत भरी खबर दे दी है।
बता दें कि एमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी के बिहार चुनावों में एंट्री के बाद से ही बिहार का राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ था। माना जा रहा था कि ओवैसी के आने के बाद बिहार में वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है। खासकर मुस्लिमों में ओवैसी की बढ़ती लोकप्रियता जहां मुस्लिम वोटों का रुझान उनकी ओर कर सकती थी वहीं उनके भड़काऊ बयानों के चलते हिंदू वोटो का भी एकतरफा ध्रुवीकरण हो सकता था।