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'भागवत के बयान ने बदली बिहार की चुनावी तस्वीर'

Sun, 11 Oct 2015 07:13 PM IST
हिमांशु मिश्र / अमर उजाला, दिल्ली
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बिहार में पहले चरण का मतदान 12 अक्टूबर को होगा ऐसे में अमर उजाला ने पूर्व जेडीयू नेता और सांसद शिवानंद तिवारी से की खास-बातचीत।
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क्या कहेंगे बिहार विधानसभा चुनाव के बारे में? अन्य चुनावों के मुकाबले यह कितना और किस तरह से अलग है?

चुनाव कई मायने में अहम है। सबसे पहले तो इसके परिणाम का असर राष्ट्रव्यापी होगा। यह चुनाव नीतीश और लालू ही नहीं बहुत हद तक पीएम मोदी के भविष्य को भी तय करेगा। अलग इस मायने में है कि पहली बार किसी पीएम ने चुनाव को इस तरह से अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। इससे पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि देश का प्रधानमंत्री किसी विधानसभा चुनाव में 40 रैलियां करेगा।

आप भले ही इस समय किसी दल से नहीं जुड़े हैं, मगर चुनाव पर आपकी गहरी नजर है। आपका क्या आकलन है चुनाव के बारे में?
हां, मैं शुरू से ही बिहार चुनाव पर नजर रख रहा हूं। शुरू में राजग का पलड़ा भारी दिखाई देता था। मगर चुनाव प्रचार के बीच संघ प्रमुख के आरक्षण की समीक्षा की मांग से स्थिति में तेजी से बदलाव हुआ। भाजपा ने कई तरह की रणनीतिक भूल की। शायद ऐसा अतिआत्मविश्वास के कारण हुआ। इस रणनीतिक भूल के कारण भाजपा ने लालू-नीतीश को बड़ा अवसर दे दिया।
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किस तरह की रणनीतिक भूल की भाजपा ने?
देखिये सबसे बड़ी कमी पार्टी के नेताओं का बड़बोलापन है। भाजपा नेताओं ने लालू यादव पर लगातार व्यक्तिगत प्रहार किए। इसका परिणाम यह हुआ कि यादव समुदाय लालू से अलग होने के बदले उनके पक्ष में एकजुट हो गया। नीतीश पर हमले के क्रम में भी भाजपा रणनीतिक भूल कर रही है। हमले के क्रम में नेताओं का अहं खुल कर सामने आ रहा है। मेरा राजनीतिक अनुभव है कि देश की जनता किसी भी नेता के अहं को किसी कीमत पर माफ नहीं करती।

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'जनता महंगाई से त्रस्त है'

मगर इसी बिहार में लोकसभा में राजग ने नीतीश और लालू को तगड़ी सियासी पटखनी दी थी, तब और अब के हालात में इतना अंतर कैसे आ गया?
देखिये तब राजग के पीएम पद के उम्मीदवार मोदी के बारे में आम जनमानस में एक सकारात्मक धारणा थी। उनके काम को जनता ने जांचा परखा नहीं था। अब अंतर यह है कि केंद्र में मोदी सरकार के सवा साल पूरे हो चुके हैं। जनता उनके कामों और वादों का भी आकलन कर रही है। जनता महंगाई से त्रस्त है। बुद्घिजीवी और राजनीतिक रूप से जागरूक बिहार देश में सांप्रदायिक तानाबाना बिगड़ने के संकेत से चिंतित हैं।

आपका कहना है कि भाजपा नेताओं की उग्र बयानबाजी से बिहार के सभी वर्गों में गलत संदेश जा रहा है?
देखिये बिहार में धार्मिक ध्रुवीकरण करना संभव नहीं है। यह तब भी संभव नहीं हुआ था जब नब्बे के दशक में बाबरी मस्जिद टूटी थी। इस राज्य में ऐसे बड़बोले बयानों से जिस वर्ग में भाजपा के पक्ष में माहौल बनता है, वह वर्ग पहले से ही राजग के साथ है। अन्य वर्ग ऐसी बयानबाजी और राजनीति को कभी स्वीकार नहीं करता।

आपको लगता है कि जदयू और राजद के वोट एक दूसरे को स्थानांतरित होंगे?
शुरू में ऐसा संभव नहीं लगता था। दोनों दलों ने जिस अपरिपक्वता से टिकट बांटे से उससे मुश्किलें और बढ़ गई थी। मगर बाद में लालू पर व्यक्तिगत हमलों की बाढ़, भागवत की आरक्षण के खिलाफ बयान से स्थिति धीरे धीरे बदलती चली गई।

भाजपा लालू के हिंदुओं के गोमांस खाने संबंधी बयान को तूल दे रही है, क्या इसका उसे लाभ होगा?
यह मुद्दा एक वर्ग विशेष तक सीमित है। यह वर्ग विशेष शुरू से ही राजग के साथ है। मुझे नहीं लगता कि इस बयान का कोई खास प्रभाव पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों पर पड़ेगा।
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