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तो उत्खनन लायक बिहार में कोई जमीन नहीं!

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बिहार में पुरातत्विक महत्व के चाहे जितने स्थल हो, लेकिन उत्खनन लायक कोई जमीन नहीं है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) का उत्खनन शाखा बिहार से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने लगा है। ताजा आदेश के अनुसार एएसआइ इस साल बिहार में कहीं भी उत्खनन कार्य नहीं करने जा रहा है।
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इस बात को लेकर बिहार के पुराविदों में आक्रोश है और वो एएसआइ के इस कदम को न केवल बिहार के पुरातत्विक स्थलों की उपेक्षा मान रहे हैं, बल्कि उनका कहना है कि यह बिहार के प्रति एएसआइ का दुराग्रहपूर्ण नीति है। उल्लेखनीय है कि जिस रिपोर्ट के नहीं आने से उत्खनन कार्य को बंद करने का आदेश दिया गया है, वो रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी भी आदेश देनेवाले पदाधिकारी के जिम्मे ही थी।

ऐसे में पुराविदों का कहना है कि जिन्होंने समय पर रिपोर्ट नहीं दिया, वो अपनी लापरवाही स्वीकार करने के बदले उलटा उत्खनन कार्य को ही बंद करने का आदेश पारित किया है, जो दुर्भावनापूर्ण है। जानकारों का यह भी कहना है कि जिस प्रतिवेदन का बहाना बना कर बिहार में उत्खनन कार्य रोका गया है, इस आधार पर किसी दूसरे राज्य में इस काम को नहीं रोका गया है।
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एएसआई सफेद हाथी

उत्तर प्रदेश के मलहर, राजानगर और लहुरादेवा का उत्खनन कार्य बिना प्रतिवेदन प्रस्तुत किये ही कराया गया। इस संबंध में पिछले दिनों पटना संग्रहालय में पुराविदों की एक बैठक भी हुई। इसमें बैठक में एएसआइ को सफेद हाथी करार देते हुए कहा गया कि यह बिहार में उत्खनन, संरक्षण या सर्वेक्षण कोई भी काम नहीं कर रहा है।

वक्ताओं का कहना था कि एएसआइ न तो खुद कर रहा था और ना दूसरों को करने दे रहा है। ऐसे बिहार में का इतिहास दुनिया के सामने नहीं आ पा रहा है। मालूम हो कि एएसआइ की स्थापना के बाद 1938 में बिहार का बलिराजगढ पहला संरक्षित स्थल बना, जहां 1962 में उत्खनन का कार्य प्रारंभ हुआ। यहां अब तक रुक-रुक कर तीन बार कुछ-कुछ दिनों के लिए उत्खनन का कार्य हुआ है।

विश्व के ज्ञात इतिहास को बदल देते के पुख्ता सबूत मिलने के बावजूद बलिराजगढ में उत्खनन का काम एक बार फिर रोक दिया गया है। इसी प्रकार तेल्हाडा(नालंदा), चौसा(बक्सर), कुटंबा(औरंगावाद) और चेचर(वैशाली) जैसे महत्वपूर्ण स्थलों पर भी उत्खनन कार्य नहीं होंगे। नालंदा के रुक्मिणी स्थल समेत सभी उत्खनन स्थलों पर काम बंद कर दिया गया है।
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एएसआई पर लगा आरोप

बिहार हिस्ट्री कांग्रेस के उपाध्यक्ष डा चितरंजन सिन्हा ने एएसआइ की इस कार्रवाई को दुराग्रहपूर्ण और आश्चर्यजनक बताया है। श्री सिन्हा कहते हैं कि यह काम उस कालखंड में रोका गया है जब राज्य के मुख्यमंत्री न केवल उत्खनन को लेकर जिज्ञासू हैं, बल्कि तमाम स्थलों का भ्रमण कर उत्खान कार्य में तेजी लाने का अनुरोध कर चुके हैं।

बिहार पुराविद परिषद के महासचिव डा उमेश चंद्र द्विवेदी ने इस प्रकार काम को बीच में रोक देने से पहले किये गये उत्खनन अनर्थक हो जायेंगे।

उत्खनन कार्य कब शुरु किया जाये और कब बंद किया जाये, अधिकार उत्खननकर्ता के पास होता है। एएसआइ को उत्खनन पूरा हो यह सुनिश्चित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि एएसआइ के पास सबसे ज्यादा लंबित परियोजना बिहार से ही है, इसके बावजूद इस प्रकार की कार्रवाई अचंभित करनेवाली है।
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