अपनों के लिए तो सब जीते हैं लेकिन जो दूसरों के लिए जीते हैं उनकी जिंदगी का मजा ही कुछ और होता है... ऐसे एक शख्स हैं दिलबाग सिंह। दिलबाग ने पंजाब सरकार के सत्ता के गलियारों से लेकर हाईकोर्ट में इतना जबरदस्त संघर्ष किया और जहांगीर के सपने को साकार कर दिया।
जहांगीर ने सन 1618 में एक सपना देखा था कि उसकी बेगम नूरजहां के आदेशों पर जो सराय तैयार की गई है, वह विश्वविख्यात हो। आज नूरमहल की यह सराय पूरे विश्व में विख्यात हो चुकी है और इसके पीछे एक ही व्यक्ति ने संघर्ष किया है, वह हैं गांव बैनापुर के दिलबाग सिंह।
ऐतिहासिक धरोहर का बदल गया था हुलिया
1618 में जहांगीर ने अपनी बेगम नूरजहां के कहने पर आलीशान सराय तैयार करवाई थी। इस ऐतिहासिक इमारत को विश्व प्रसिद्ध बनाना तो दूर तो सरकार ने इसमें अपने कार्यालय तैयार कर रखे थे। जिसमें नूरमहल थाना, नूरमहल का सीनियर सेकेंडरी स्कूल, नूरमहल का प्राइमरी स्कूल व पीडब्लयूडी का कार्यालय बना दिया। इसके अलावा नगर काउंसिल ने भी कुछ कमरों पर कब्जा कर अपना सरकारी कार्यालय तैयार कर दिया।
सराय बेशक पुरातत्व विभाग के अधीन थी लेकिन अवैध निर्माण व कमरे तैयार कर ऐतिहासिक धरोहर का हुलिया बिगाड़ दिया। इन सबको निकालने व ऐतिहासिक इमारत को विश्व प्रसिद्ध बनाने के लिए बैनापुर के दिलबाग सिंह ने झंडा उठाया। 16 फरवरी 1953 को जन्मे दिलबाग सिंह के दिल में कसक थी कि किसी तरह से इस सराय को वापस उसी हालत में लाया जाए, जैसा निर्माण जहांगीर ने किया था।
2000 में दिलबाग सिंह ने पत्र लिखे कि सराय पुरातत्व विभाग की है, इसमें सरकारी विभागों के कार्यालय खाली करवाए जाएं। तमाम सरकारी कार्यालय जिसमें पंजाब शिक्षा विभाग, पंजाब के डीजीपी, होम सचिव, लोकनिर्माण विभाग, निकाय विभाग को लिखा कि कार्यालयों को खाली करवाया जाए लेकिन किसी ने एक नहीं सुनी।
हाईकोर्ट में दायर की याचिका
दिलबाग सिंह ने सरकारी कार्यालयों का कब्जा हटवाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि इमारत पुरातत्व विभाग की है, वह अपनी ड्यूटी के प्रति सजग है। मामला उसके पास लाया जाए, अगर पुरातत्व विभाग कुछ नहीं करता तो याची दोबारा याचिका दायर कर सकता है। दिलबाग सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और दोबारा शिकायत पुरातत्व विभाग को दी कि नूरमहल की ऐतिहासिक सराय से सरकारी स्कूल, पुलिस थाना व अन्य कार्यालय हटाए जाएं। दो साल तक मामला लटकता रहा, पुरातत्व विभाग ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि वह इमारत को खाली नहीं करवा सकते।
2002 में दिलबाग सिंह ने दोबारा हाईकोर्ट में याचिका दायर की कि पुरातत्व विभाग के बस की बात नहीं है, ऐतिहासिक इमारत खाली करवायी जाए। सरकार की तरफ से 29 जनवरी 2003 को शपत्र पथ दायर किया कि सरकारी स्कूल दो साल के भीतर व थाना एक साल के भीतर ऐतिहासिक इमारत से निकाल दिया जाएगा और बिल्डिंग पुरातत्व विभाग को दे दी जाएगी। 2 जनवरी 2004 को ऐतिहासिक इमारत से थाना निकल गया और 17 जनवरी 2005 को सरकारी स्कूल भी निकल गए। धीरे-धीरे सारे महकमे शिफ्ट हो गए।
अवैध बिल्डिंग गिराई
दिलबाग सिंह बताते हैं कि जहांगीर के सपनों को तो पूरा ग्रहण लग चुका था, अंदर अवैध कमरे तैयार हो चुके थे। उन्होंने पुरातत्व विभाग के साथ लगातार बैठक की और इसकी रेनोवेशन व पुराना नक्शा निकलवाया। अंदर दीवारों को सुरक्षित करवाया गया। लंबे समय बाद ऐतिहासिक इमारत दोबारा अपने पुराने स्टाइल में पुरातन की तरह दिखने लगी है। अंदर पार्क व फव्वारे लगाए गए हैं। लोग पर्यटन का पूरा आनंद ले रहे हैं और बिल्डिंग इन दिनों विश्व के मानचित्र पर भी उभरने लगी है। उनका कहना है कि दिल की कसक अभी बाकी है। नूरमहल सराय के बाहर आसपास अवैध कब्जे हो गए हैं, इनके लिए अब संघर्ष करना है।