एक पुराने केस से उठा मुद्दा
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, यह टिप्पणी 30 अक्तूबर को उस समय आई जब अदालत ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की अपील पर सुनवाई की। कंपनी ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे एक 1996 के सड़क हादसे में मारे गए व्यक्ति के परिवार को ब्याज सहति करीब 10 लाख रुपये मुआवजा देने को कहा गया था।
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कोर्ट ने IRDAI और बीमा कंपनियों से मांगे सुझाव
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 22 बीमा कंपनियों के जनरल मैनेजरों, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) (आईआरडीएआई) और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के प्रतिनिधियों से चर्चा की। इसी दौरान वरिष्ठ वकील जॉय बसु ने अदालत को बताया कि देश में लगभग 50 प्रतिशत गाड़ियां बिना वैध बीमा के चल रही हैं।
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बिना बीमा गाड़ियों पर सख्ती का संकेत
इस पर अदालत ने सुझाव दिया कि जैसे चालान न भरने पर गाड़ियों को जब्त किया जाता है, उसी तरह बीमा न होने पर भी कोई कड़ा नियम बनाया जा सकता है। कोर्ट ने आईआरडीएआई और इंश्योरेंस कंपनियों से कहा कि वे ऐसी नीति बनाएं जिससे हर वाहन का बीमा अनिवार्य रूप से सुनिश्चित हो सके।
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इंश्योरेंस सेक्टर की चिंता- डेटा की कमी और नियमों की ढिलाई
बीमा उद्योग के विशेषज्ञों ने कहा कि देश में इंश्योरेंस कवरेज का स्तर सिर्फ 50 प्रतिशत के आसपास है, जो बेहद चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीराम जनरल इंश्योरेंस के सीईओ ने बताया कि कंपनियों के पास गाड़ियों के मालिकों का रियल-टाइम डेटा या अपडेटेड संपर्क जानकारी नहीं होती। कई बार गाड़ियां कब की कबाड़ हो चुकी होती हैं, लेकिन रिकॉर्ड में अब भी दर्ज रहती हैं।
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राज्यों से सहयोग और सरकार की भूमिका अहम
एक अन्य अधिकारी ने बताया कि बीमा कंपनियों ने खासकर ओडिशा जैसे राज्यों से अपील की है कि वे बिना बीमा वाली गाड़ियों के मालिकों को सामूहिक संदेश भेजें। हालांकि, कंपनियों के पास कानूनी रूप से कोई कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। इसलिए उन्होंने सरकार से अपील की है कि वह इस नियम को सख्ती से लागू करवाने के लिए कदम उठाए।
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