वैदिक ज्योतिष के 12 भावों में छठे, आठवें और बारहवें भाव को दु:स्थान कहा गया है। विद्वानों के अनुसार इन भाव में शुभ ग्रह अच्छा फल नहीं देते है, अगर इन भावों में शुभ ग्रह पाप पीड़ित हो तो जातक जीवन भर परेशानी से घिरा रहता है। दरअसल छठे भाव से शत्रु, रोग और ऋण का, आठवें से दुर्घटना, मृत्यु और बारहवें भाव से खर्च और कारावास का विचार होता है। लेकिन क्या आप जानते है कि इन भावों के स्वामी भी राजयोग का निर्माण करते है। आज इस लेख में हम हम ऐसे ही राजयोग की बात करने वाले है जिसे “ हर्ष राजयोग” कहा गया है और वो छठे भाव के स्वामी से ही बनता है।
विज्ञापन
1 - ज्योतिष के ग्रंथों में यह लिखा गया है कि अगर छठे भाव का स्वामी अपने ही भाव में, आठवें भाव में या बारहवें भाव में हो ऐसा व्यक्ति विपरीत राजयोग का फल प्राप्त करता है।
2 - दरअसल दु:स्थान का स्वामी अगर दु:स्थान में ही तो विद्वानों के मत से वो हानि नहीं करेगा बल्कि भाव से जुड़े बुरे परिणाम को रोक देगा।
3 - अगर छठे भाव का स्वामी अपने ही भाव में विराजमान है तो ऐसा व्यक्ति शत्रुहंता होगा। उसके शत्रु होंगे भी तो अपने आप नष्ट होंगे। उसे कोई गंभीर बीमारी नहीं होगी और उसे नौकरी बढ़िया मिलेंगी।
4 - अगर छठे भाव का स्वामी आठवें भाव में हो तो ऐसा जातक गुप्त विद्या में सफल होगा। उसे कठिन मृत्यु नहीं मिलती है और ना ही उसका एक्सीडेंट होगा।
5 - अगर छठे भाव का स्वामी बारहवें भाव में हो तो ऐसा जातक यात्राओं से धन अर्जित करता है। उसे विदेश से लाभ मिलता है और वो नौकरी में उच्च पद प्राप्त करता है।
6 - ज्योतिष के सूत्र के मुताबिक छठे भाव की महादशा रोग, शत्रु वृद्धि करती है लेकिन अगर उसका स्वामी अगर विपरीत राजयोग में है तो वही महादशा उसे तमाम सुख देनी वाली बन जाती है।
उदाहरण के लिए अगर कुम्भ लग्न की कुंडली में छठे भाव का स्वामी चन्द्रमा बलवान होकर अगर उसी भाव में विराजमान हो जाए तो वह अशुभ फल नहीं करेगा जबकि नियम के मुताबिक छठे भाव का चंद्र मन को अशांत करने वाला और रोगी बनाने वाला कहा गया है।
विपरीत राजयोग के कारण अब यही चन्द्रमा जातक को माता की सम्पत्ति का स्वामी और बड़ा व्यापारी बनाने वाला होगा। आज इस लेख में हमनें छठे भाव की बात की है। आगे के लेख में हम आठवें भाव के बारे में आपको बताएंगे।