1 - अगर किसी कुंडली में नीच का पाप ग्रह छठे भाव में हो और लग्नेश दुर्बल हो तो ऐसा व्यक्ति कर्ज का शिकार होता है। अगर मारकेश छठे भाव में सम्बन्ध बना रहा तो तो मुमकिन है कि बीमारी के लिए जातक कर्ज ले। यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि सूत्र में पाप ग्रह नीच राशि में ही होना चाहिए। छठे भाव में सूर्य, मंगल और राहु जैसे ग्रह शुभ फल कारक माने गए है। ये व्यक्ति के शत्रु का नाश करते है लेकिन अगर ग्रह नीच है और पीड़ित है तो वो व्यक्ति को शुभ फल नहीं देता है।
2 - छठे भाव में ग्रहण योग हो और धन, लाभ के स्वामी पीड़ित हो तो भी जातक कर्ज में जाता है। दरअसल राहु-सूर्य, सूर्य-मंगल, सूर्य-केतु जैसे पाप ग्रह अगर छठे भाव में युति करे तो वो उस भाव के शुभ फल में कमी करते है। उस स्थिति में ये आवश्यक हो जाता है कि धन और लाभ के स्वामी बलवान हो लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो जातक उन ग्रहों की दशा में अवश्य ही कर्जदार होगा।
3- छठे भाव का स्वामी खुद कमजोर हो और छठे भाव में शनि राहु, शनि मंगल या शनि केतु की युति हो तो भी यह योग बनता है। दरअसल छठे भाव को उपचय भाव यानी वृद्धि का भाव कहा गया है। अगर छठे भाव का स्वामी नीच होकर केंद्र में जाए तो भाव के शुभ फल में कमी हो। वहीं शनि मंगल या शनि राहु की युति इस भाव में मनुष्य के शत्रु द्वारा धन का नाश करवाती है। शनि मंगल की युति छठे भाव में कभी भी व्यक्ति को सफल नहीं होने देती।
4- गुरु अगर धन का स्वामी होकर राहु के साथ छठे भाव में हो और लग्नेश कमजोर हो तो भी व्यक्ति पीड़ित होता है। दरअसल गुरु जीव कारक ग्रह है और राहु के साथ युति होने पर वो गुरु चांडाल योग का निर्माण करता है। यह युति जिस भाव में होती है उसी भाव के शुभ फल में कमी आ जाती है। राहु छल का कारक है और छठा भाव शत्रु का, अगर गुरु धन का स्वामी होकर छठे में बैठे और राहु भी वही हो तो ऐसे व्यक्ति का धन छल कपट से लूट लिया जाता है और वो कर्ज में डूबता है।
पं. मनोज कुमार द्विवेदी
ज्योतिषाचार्य कानपुर