इस कुंडली में शनि लग्नेश मंगल का शत्रु भी है जिसके कारण स्त्री की परिवारजनों से उतनी नहीं बनती। वृश्चिक लग्न की कुंडली के लिए गुरु प्रबल मारकेश का काम करता है क्योंकि उसकी मूल त्रिकोण राशि धनु दूसरे भाव में है। जैसा की फलित का नियम है की स्त्री की कुंडली में पति का कारक गुरु है और इस कुंडली में वो आठवें भाव में यानी अशुभ भाव में है। इस आठवें भाव में बैठे मारकेश गुरु पर मंगल शनि का सीधा प्रभाव है।
हालांकि गुरु की सप्तम दृष्टि के प्रभाव से जातिका धनी है। इस जातिका की कुंडली में मंगल और गुरु की अशुभ स्थिति के साथ सप्तम भाव भी पीड़ित है। इस कुंडली में सप्तम शुक्र अकारक बुध और पाप ग्रह राहु के साथ है। बुध और राहु के अंश लगभग समान होने के कारण सप्तम भाव का कोई भी शुभ फल जातिका को नहीं मिला।
वृश्चिक लग्न की कुंडली में बुध आठवें और ग्यारहवें भाव का स्वामी होने से अकारक का फल करता है और सप्तम के स्वामी के साथ उसकी युति होने के कारण उसने सप्तम भाव के शुभ फलों को नष्ट कर दिया। फलित का सर्वमान्य नियम है कि सप्तम भाव का स्वामी अगर तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में पाप ग्रह या अकारक ग्रह से पीड़ित हो तो उसे शुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
इस महिला की कुंडली में सौभाग्य के कारक मंगल का शनि से पीड़ित होना, पति के कारक गुरु का अशुभ भाव में जाकर पाप ग्रह के प्रभाव में आना और सप्तमेश शुक्र का एक से अधिक ग्रहों के साथ होने के कारण पति की मृत्यु और उसके बाद विवाह का योग बनता हुआ दिखाई दे रहा है।