इलाहाबाद स्थित अकबर के किले में एक ऐसा वट है जो कभी यमुना नदी के किनारे हुआ करता था और जिस पर चढ़कर लोग मोक्ष की कामना से नदी में छलांग लगा देते थे। इस अंधविश्वास ने अनगिनत लोगों की जान ली है। शायद यही कारण है कि अतीत में इसे नष्ट किए जाने के अनेक प्रयास हुए हालांकि यह आज भी हरा-भरा है।
यह ऐतिहासिक वृक्ष किले के जिस हिस्से में आज भी स्थित है और वहां आमजन नहीं जा सकते। यूं तो अक्षयवट का जिक्र पुराणों में भी हुआ है पर वह वृक्ष अकबर के किले में स्थित यही वृक्ष है कि नहीं, यह कहना आसान नहीं। हिन्दुओं के अलावा जैन और बौद्ध भी इसे पवित्र मानते हैं। यात्रियों को पातालपुरी मंदिर, अक्षय वट और अशोका वृक्ष देखने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है।
हिंदू धर्म के प्रमुख चार बरगद के वृक्षों में से एक अक्षय वट है। प्रयाग (इलाहाबाद) में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट जिसे बौद्धवट भी कहा जाता है और उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है। पातालपुरी मंदिर के भीतर स्थित इस अक्षय वट को अमर वृक्ष भी कहते हैं।