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निकाय की रणनीति ने दिए लोकसभा में नए समीकरणों के संकेत

Sat, 02 Dec 2017 06:10 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ शशांक मिश्र, मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ शशांक मिश्र, मेरठ Updated Sat, 02 Dec 2017 06:10 PM IST
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The strategy of the body gave the indication of the new equation in the Lok Sabha
जीत के बाद खुशी मनातीं महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

सहारनपुर। विधानसभा चुनाव के ठीक बाद हुए निकाय चुनाव में राजनीतिक दलों की रणनीति से जिले की सियासत में नए समीकरण के संकेत मिल रहे हैं। इस चुनाव में भले ही बसपा नगर निगम के मेयर की दौड़ में पिछड़ गई, मगर भाजपा को रोकने के लिए मुस्लिमों ने बसपा के फार्मूले को अमल किया। यही कारण है कि निकायों में बसपा सभी दलों से आगे रही। शहरी इलाके में भाजपा की जीत के पीछे हिन्दू मतों की एकजुटता बड़ा कारण रहा है। हालांकि कांग्रेस की मजबूती ने इमरान मसूद की मुस्लिमों की पकड़ को साबित किया है। मगर, गठबंधन की गांठ खुलते ही सपा और कांग्रेस की सियासी जमीन कमजोर हो गई है। जबकि भाजपा को रोकने में जुटे मुसलमानों ने नए विकल्प के संकेत दिए हैं। ऐसे में दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में नए समीकरणों से इनकार नहीं किया जा सकता।

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करीब आठ महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में सहारनपुर में भाजपा का विजय रथ धीमा पड़ गया था। उस वक्त गठबंधन ने सात में तीन सीटों पर कब्जा जमा लिया था, जबकि पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाजपा की रथ पूरी रफ्तार में था। विधानसभा चुनाव के ठीक बाद सहारनपुर हिंसा ने सरकार की किरकिरी कराई और सियासी जमीन कमजोर हो रही बसपा को संजीवनी मिल गई। सहारनपुर हिंसा के बाद से ही विपक्षी राजनीतिक दल दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावनाएं तलाशने में जुट गई थी। हिंसा में दलितों के बीच मजबूत बनकर उभरी भीम आर्मी के जरिए कांग्रेस यहां सेंधमारी करना चाहती थी। उधर, बसपा किसी कीमत पर दलितों में फाड़ नहीं होने की कवायद में रही। यही कारण है कि बसपा सुप्रीमो मायावती सड़क मार्ग से सहारनपुर पहुंची और दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर ही राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। ऐसे में दलितों की सहानुभूति पूरी तरह से फिर से बसपा के साथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता। दलितों की एकजुटता और सपा-कांग्रेस गठबंधन की गांठ खुलने से बेचैन मुसलमानों का रुझान निकाय चुनाव में बसपा की ओर रहा। विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने पूरे जोर के साथ गठबंधन का साथ दिया, मगर वे प्रदेश की सत्ता से भाजपा को नहीं रोक पाए। ऐसे में बसपा के गढ़ में मुस्लिमों के साथ आने से पार्टी को मजबूती मिली है, मगर यह कांग्रेस और सपा के लिए अच्छे संकेत नहीं माने जा सकते हैं। यही कारण है कि मुस्लिम मतों के जरिए विधानसभा चुनाव में मजबूत स्थिति में रही कांग्रेस को केवल तीन और सपा को एक निकाय में जीत मिली। जबकि छह निकायों में बसपा ने अपना परचम लहराया। इसके पीछे सीधे तौर कांग्रेस और सपा के बेस वोट बैंक मुस्लिमों केे बसपा के पाले में जाना माना जा रहा है। आगामी लोकसभा चुनाव के रिहर्सल के रुप में देखे जा रहे निकाय चुनाव में बसपा का फार्मूला काफी हद तक सकरात्मक संकेत दे गया। मेरठ नगर निगम में जीत और सहारनपुर में मिली मामूली हार से मुसलमान ज्यादा एकजुट हो सकते हैं। यहां बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में करीब चार लाख मत हासिल करने वाले पूर्व विधायक इमरान मसूद उनके हीरो के रुप में उभरे। मगर, निकाय चुनाव में बसपा से 11 में छह निकायों पर मुस्लिम चेहरों को तवज्जों देकर अपने फार्मूले का लिटमस टेस्ट कर लिया है। ऐसे में आने वाले समय में सहारनपुर सहित पश्चिम उत्तर प्रदेश में नए समीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता है।
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भाजपा को दिख रहा है ज्यादा नुकसान
सहारनपुर हिंसा के बाद हो रहे निकाय चुनाव में भले ही नगर निगम और सरसावा नगर पालिका पर भाजपा ने जीत हासिल कर ली, मगर बाकी निकायों में उसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि भाजपा का हिन्दू मतों से दलित अब बाहर आने लगा है। यही कारण है कि बसपा को उससे मजबूती मिल रही है और भाजपा को इसका नुकसान उठना पड़ा रहा है। दो निकायों में जीत हासिल करने वाली भाजपा केवल तीन निकाय में ही रनर अप के रुप में सामने आई। जबकि छह निकायों में उसकी स्थिति ज्यादा खराब रही।

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