एक जख्म के साथ ये सफर शुरू हुआ था। बंटवारे से कुछ लाख जिस्म मरे थे। मगर आत्मा पूरे मुल्क की लहूलुहान हुई थी। वही सफर अब इकहत्तरवें साल की दहलीज पर है। आज पीछे मुड़कर देखेंगे तो जख्म नहीं, फूल नजर आएंगे। तरक्की और अमन के फूल। उपलब्धियों के फूल। इनमें से चुनींदा सत्तर की बात अमर उजाला डॉटकॉम करेगा। वह बताएगा कि सत्तर बरस की यात्रा में क्या है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। साथ ही हम बात सत्तर चुनौतियों की भी करेंगे। देखते रहिए amarujala.com
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