...तब विष्णु ने पृथ्वी को जल से निकाला
ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करने वाले माने जाते हैं। जब संसार को रचने की जरूरत आई और इसका जिम्मा ब्रह्मा को सौंपा गया। तब पृथ्वी जलमग्न थी। भगवान की सहायता से उसका उद्धार होना था। ब्रह्मा ने विष्णु से प्रार्थना की कि आप पृथ्वी को जल से निकालें। तब विष्णु ने पृथ्वी को जल से निकाला। फिर ब्रह्मा ने अपने शरीर से एक दंपत्ति को प्रकट किया, पति मनु और पत्नी शतरूपा। सनातन धर्म की मान्यता है कि श्रेष्ठ संतति का संकल्प होना चाहिए। केवल संतति होने से काम नहीं चलेगा। संतान ऐसी हो, जो गौरव बने, जिनके ज्ञान-विज्ञान का विस्तार हो। केवल वासना से उद्वेलित या प्रेरित होकर संतान का जो क्रम अपनाते हैं, वह गलत है। संतति तो संयम, नियम से मन को शुद्ध करके ही उत्पन्न होनी चाहिए, तभी सही संतति होगी। अभी तो लोग भोग के लिए ही जी रहे हैं, शायद। लगे हैं कि भोग में कहीं कोई न्यूनता नहीं आए।
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संसार में जो आप देख रहे हैं, ईश्वर को ही देख रहे हैं। मनु ने वन में घूम-घूमकर संयम नियम व्रत किया। भगवान की दया से उन्होंने मांगा कि जो परम भगवान हैं, जो सबका पालन करते हैं, जिनके कारण सूर्य और चंद्रमा हैं, जो समय से उगते-डूबते हैं, जिनके प्रभाव से वायु नियंत्रित है, जिनके कारण समुद्र मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, जिनसे वह नियंत्रित होता है। शास्त्रों ने जिन्हें कहा कि वह सर्वत्र व्यापक है, वही बनाते, पालन करते, संहार करते हैं, कर्म फल वही देते हैं। मन में आना चाहिए कि हम भगवान को देखें। हमारी दृष्टि जब व्यापक होगी, संपूर्ण संयम-नियम से सज्जित होगी, तभी हम उन्हें देखने की योग्यता वाले हो सकेंगे। बड़े लोग कहते हैं कि मांगो, भगवान जब प्रसन्न होते हैं, तो कहते हैं कि मांगो। श्रेष्ठतम जीवन वालों को ही अवसर मिलता है। भगवान से केवल उनकी भक्ति को चाहते हैं।