पुराने जमाने में जंगलों और बागों के पेड़ों पर चहल कदमी करने वाले उल्लू का कुनबा पेड़ों की कमी के कारण अब सिमटता जा रहा है। उल्लू अब गांवों में भी नजर नहीं आ रहे है। ये अब विलुप्त होते जा रहे है। वन्य जीव संरक्षण के तहत तत्परता से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस पक्षी के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाएगा।
पेश है कन्नौज से एक रिपोर्ट...
पहले जमाने के गांवों में बाग और जंगलों बड़ी संख्या में हुआ करती थी। पेड़ों की खोह में दिन में अपना आवास बनाकर बसेरा करने वाले उल्लू अब गायब होते जा रहे हैं। उल्लू की कई प्रजातियां रात के समय निकलकर अपने शिकार की तलाश में खेतों में दिखाई दे जाते थे। कभी-कभी गांव के पेड़ों पर बैठकर रात के समय घूं-घूं की आवाज करते थे तो बुजुर्ग लोग आने वाले समय से अपशगुन होने का संकेत मानते थे।
गांव वाले कहते हैं कि अब अल्लू बोल नहीं रहा है। अब धीरे-धीरे मानव जाति ने जंगलों को काटकर उल्लुओं के आवासों को छीन लिया है। जिससे इस पक्षी के लिए रहने के लिए खोह नहीं मिल रही। जिस कारण कई बार दिन में उल्लू भटक जाते है और उनका विरोधी कौआ झुंड के रूप में आक्रमण कर उसे मार देता है।
वहीं दूसरी ओर अब कुछ लोग अंध विश्वास के चलते उल्लू के बीस नाखूनों को काटकर अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए इनको पकड़कर मरने को मजबूर कर रहे है। तालग्राम क्षेत्र में कई दिनों से अमोलर गोड़ी नाले के पास मरे हुए उल्लू देखे जा सकते है। समय रहते वन विभाग की ओर से कोई ठोस कदम न उठाया गया तो इंसान की नजरों से उल्लू पक्षी भी ओझल हो जाएंगे।
वन रेंजर, गुरसहायगंज एके मिश्रा ने बताया कि वैसे को उल्लू की दर्जनों प्रजातियां होती है। लेकिन अपने कन्नौज क्षेत्र में चार या पांच प्रजातियों के उल्लू पाए जाते है। उनकी संख्या घटने का प्रमुख कारण यह है कि पहले वह बड़े-बड़े पेड़ों पर अपना घोसला बनाकर रहते थे। अब पेड़ गायब हो गए हैं।