पौष मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला नामक एकादशी कहा गया है। यह एकादशी व्रत इस वर्ष 24 दिसंबर को है। शास्त्रों के अनुसार यह एकादशी अपने नाम के अनुसार मनोकामना सफल करने वाली एकादशी है। पुराणों में बताया गया है कि जो व्यक्ति विधिवत रूप से एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण करता है उसे वर्षों तक तपस्या करने का पुण्य प्राप्त होता है।
जो व्यक्ति यह एकादशी करते हैं, उनका जीवन सफल और कामयाब हो जाता है
पद्म पुराण में सफला एकादशी के महात्म्य का वर्णन मिलता है। भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया है कि सफला एकादशी व्रत के देवता श्री नारायण हैं। जो व्यक्ति सफला एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करता है। रात्रि में जागरण करते हैं ईश्वर का ध्यान और श्री हरि के अवतार एवं उनकी लीला कथाओं का पाठ करता है उनका व्रत सफल होता है।
जो व्यक्ति यह एकादशी करते हैं, उनका जीवन सफल और कामयाब हो जाता है
इस प्रकार से सफला एकादशी का व्रत करने वाले पर भगवान प्रसन्न होते हैं। व्यक्ति के जीवन में आने वाले दुःखों को पार करने में भगवान सहयोग करते हैं। जीवन का सुख प्राप्त कर व्यक्ति मृत्यु के पश्चात सद्गति को प्राप्त होता है।
जो व्यक्ति यह एकादशी करते हैं, उनका जीवन सफल और कामयाब हो जाता है
पद्म पुराण में सफला एकादशी की जो कथा मिलती है उसके अनुसार महिष्मान नाम का एक राजा था। इनका ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक पाप कर्मों में लिप्त रहता था। इससे नाराज होकर राजा ने अपने पुत्र को देश से बाहर निकाल दिया। लुम्पक जंगल में रहने लगा। पौष कृष्ण दशमी की रात में ठंड के कारण वह सो न सका। सुबह होते होते ठंड से लुम्पक बेहोश हो गया।
जो व्यक्ति यह एकादशी करते हैं, उनका जीवन सफल और कामयाब हो जाता है
आधा दिन गुजर जाने के बाद जब बेहोशी दूर हुई तब जंगल से फल इकट्ठा करने लगा। शाम में सूर्यास्त के बाद यह अपनी किस्मत को कोसते हुए भगवान को याद करने लगा। एकादशी की रात भी अपने दुःखों पर विचार करते हुए लुम्पक सो न सका। इस तरह अनजाने में ही लुम्पक से सफला एकादशी का व्रत पूरा हो गया। इस व्रत के प्रभाव से लुम्पक सुधर गया और इनके पिता ने अपना सारा राज्य लुम्पक को सौंप दिया और खुद तपस्या के लिए चले गये।