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मैच फिक्सिंग और स्पॉट फिक्सिंग में अंतर

Thu, 16 May 2013 04:04 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Thu, 16 May 2013 04:04 PM IST
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sreesanth held over spot fixing charges

क्रिकेट में मैच फिक्सिंग का पहला आरोप 1994 में पाकिस्तान पर लगा था। उस समय तत्कालीन कप्तान सलीम मलिक पर मैच फिक्स करने और यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया के पाकिस्तान दौरे के दौरान विरोधी टीम के खिलाड़ियों शेन वार्न और मार्क वा को लचर प्रदर्शन करने के लिए पैसे की पेशकश करने का आरोप लगा था।

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इसके बाद क्रिकेट में मैच फिक्सिंग को लेकर कई मामले आए। कुछ मामलों को छोड़कर लगभग सभी में खिलाड़ी बरी हो गए। लेकिन हालिया दिनों में मैच फिक्सिंग की जगह स्पॉट फिक्सिंग के ज्यादा मामले सामने आए हैं।
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स्पॉट फिक्सिंग मामले में सबसे पहले पाक खिलाड़ी पकड़े गए थे। 2010 के इंग्लैंड दौरे में पाकिस्तान के तीन बड़े खिलाड़ी सलमान बट, मोहम्मद आसिफ और मोहम्मद आमिर स्पॉट फिक्सिंग में दोषी पाए गए।
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क्या है मैच फिक्सिंग?
मैच फिक्सिंग में मैच का रिजल्ट पहले तय हो जाता है। इसके लिए बुकी टीम के खिलाड़ियों को अपना प्रदर्शन खराब करने के लिए पैसे देता है। हालांकि इस खेल में किसी एक खिलाड़ी की वजह से कभी कभी पासा पलट भी जाता है। जो खिलाड़ी मैच फिक्स नहीं करता है वो अपने प्रदर्शन से मैच के परिणाम पर असर डाल देता है। जिस कारण मैच फिक्सिंग करने वाले बुकी को कई बार नुकसान उठाना पड़ता है।

क्या है स्पॉट फिक्सिंग?

माना जाता है इसमें मैच के परिणाम के अलावा सब कुछ फिक्स होता है। स्पॉट फिक्सिंग में मैच का एक हिस्सा फिक्स किया जाता है। इसमें बुकी तय करता है कि मैच के दौरान कौन सी गेंद नो बॉल होगी या किस गेंद को वाइड फेंकना है। यही नहीं किस गेंद को गेंदबाज फुलटॉस फेंकेगा इस तरह के फैसले बुकी करता है। इसके लिए बुकी टीम के कुछ खिलाड़ियों से सांठगांठ करता है। बुकी के इशारे पर खिलाड़ी वही करता है, जो वो पहले से तय कर चुका होता है।


स्पॉट फिक्सिंग से कैसे लगता है सट्टा
स्पॉट फिक्सिंग की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि बुकी को पहले से पता होता है कि किस समय क्या होने वाला है। इस आधार पर सट्टा मार्केट में हर गेंद पर सट्टा लगता है। टी-20 मैच में स्पॉट फिक्सिंग करना बहुत आसान होता है। क्योंकि क्रिकेट के इस फॉर्मेट में सब कुछ बहुत जल्दी होता है।

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