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flashback of zindigi ke safar me gujar jate han jo mukam song
मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

ऐसा लगा आपको? हर पिछला निर्णय सही नहीं होता...

  • रोहित मिश्र / अमर उजाला, नई दिल्ली
  • शनिवार, 1 जुलाई 2017
ज़िंदगी में हम क्या विकल्प चुनते हैं उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह होता है‌ कि हम कौन सा विकल्प छोड़ते हैं। ये सवाल सिर्फ़ हालातों का नहीं लोगों का भी है। ज़िंदगी में एक दौर ऐसा भी आता है जब आप हम अतीत की तरफ़ बढ़ते हैं तो सोचते हैं कि वो दिन शायद बेहतर थे। वो लोग शायद बेहतर थे, वो मक़ाम शायद बेहतर था। वो फ़ैसले शायद ग़लत थे और वे निर्णय शायद जल्दबाज़ी में लिए गये थे। 

1974 में आई फ़िल्म आपकी कसम का यह गाना मुझे अपने हालातों से रू-ब-रू होने और फ्लैशबैक में जाकर चीज़ों को देखने और उन्हें टटोलने का मौक़ा देता है। गाने की पहली लाइन ही हमको हमीं से दो चार कराती है। 

बहुत दर्द भरी आवाज़ के साथ यथार्थवादी होते हुए किशोर कुमार गाते हैं

ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मक़ाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते


वो 'फिर नहीं आते' में ज़ोर देना असल में अपनी कहानी ही लगती है। लग रहा है कि एक चेतावनी सी दी जा रही है। जैसे-जैसे यह गाना आगे बढ़ता जाता है यह मानों आपसे सवाल करता हुआ चलता है। यह गाना सुनते वक़्त मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि मानों ये मेरे ऊपर ही लिखा गया है। 

सृजन की सफलता भी इसी बात में है कि हर पढ़ने वाले को लगे कि वह उसी के लिए लिखा गया है। वह ख़ुद को उस पात्र के रूप में रखे तो इस नज़रिए से गाने की हर लाइन मुझे अपनी ही लगती है। 

फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं मगर
पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं


इन लाइनों में एक तरह की चेतावनी है। चेतावनी है वर्तमान की उपेक्षा की। साथ ही यह लाइन थोड़ी सी फ़िलॉसिफ़कल हो जाती है। फ़िलॉसफ़ी कहती है कि ज़िंदगी मौके़ सबको देती है फूल बनाकर। लेकिन यदि हम उन मौक़ों के प्रति असंवेदनशील होते हैं वो मौक़े हमारे हाथ से चुपचाप सरक जाते  हैं। 

संभावनाओं के साथ गाने की लाइनें जीवन में आने वाले लोगों की तरफ़ भी इशारा करती हैं। यहां भी एक चेतावनी है कि यदि आपने उनकी क़द्र न समझी तो वो लोग ज़िंदगी में लौटकर फिर उस तरह से नहीं आते। आगे पढ़ें

कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं...

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