आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मूंद लो आंखें शाम के मानिंद, ज़िन्दगी की चार तरफ़ें मिट गई हैं 

शमशेर बहादुर सिंह
                
                                                         
                            शमशेर बहादुर सिंह का जन्म तारीफ़ सिंह के पुत्र के रूप में 13 जनवरी 1911 को देहरादून में हुआ। मृत्यु 12 मई 1993 को अहमदाबाद में हुई। देहरादून ननिहाल था। शमशेर के भाई तेज बहादुर उनसे दो साल छोटे थे। उनकी मां परम देवी दोनों भाइयों को राम-लक्ष्मण की जोड़ी कहती थीं। शमशेर 8-9 साल के थे जब वे संसार छोड़ गयीं। लेकिन यह जोड़ी शमशेर की मृत्यु तक बनी रही। शमशेर चौबीस वर्ष के थे तभी उनकी पत्नी धर्मवती छह वर्ष के साथ के बाद 1935 में टीबी से दिवंगत हो गईं। जीवन का यह अभाव कविता में विभाव बनकर हमेशा मौजूद रहा। काल ने जिसे छीन लिया, उसे अपनी कविता में सजीव रखकर शमशेर काल से होड़ लेते रहे।
                                                                 
                            

प्रमुख कृतियां- कुछ कविताएं, कुछ और कविताएं, चुका भी हूं मैं नहीं, इतने पास अपने, उदिता: अभिव्यक्ति का संघर्ष, बात बोलेगी, काल तुझसे होड़ है मेरी 

मूंद लो आंखें
शाम के मानिंद
ज़िन्दगी की चार तरफ़ें
मिट गई हैं 

बंद कर दो साज़ के पर्दे 
चांद क्यों निकला, उभरकर...?

घरों में चूल्हे
पड़े हैं ठंडे 
क्यों उठा यह शोर?
किसलिए यह शोर?

छोड़ दो संपूर्ण--प्रेम,
त्याग दो सब दया--सब घृणा
ख़त्म हमदर्दी 
ख़त्म --
साथियों का साथ 

रात आएगी
मूंदने सबको 

साभार: कविता कोश 
9 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर