-मोमिन ख़ां मोमिन-
तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहब
कहीं साया मेरा पड़ा साहब
है ये बंदा ही बेवफ़ा साहब
ग़ैर और तुम भले भला साहब
क्यूं उलझते हो जुम्बिश-ए-लब[1] से
ख़ैर है मैं ने क्या किया साहब
हाए री छेड़ रात सुन-सुन के
हाल मेरा कहा कि क्या साहब
दम-ए-आख़िर[2] भी तुम नहीं आते
बंदगी अब कि मैं चला साहब
किस से बिगड़े थे किस पे ग़ुस्सा था
रात तुम किस पे थे ख़फ़ा साहब
किस को देते थे गालियां लाखों
किस का शब ज़िक्र-ए-ख़ैर था साहब
नाम-ए-इश्क़-ए-बुतां न लो 'मोमिन'
कीजिए बस ख़ुदा-ख़ुदा साहब
1.लब का हिलना 2.आखरी सांंस
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