आँखों में जल रहा है पर बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआँ
पलकों के ढाँपने से भी, रुकता नहीं धुआँ
कितनी उँड़ेलीं आँखें पर बुझता नहीं धुआँ
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ
चूल्हे नहीं जलाये कि बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआँ
काली लकीरें खींच रहा है फ़िज़ाओं में
बौरा गया है, मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ
आँखों के पोछने से लगा आग का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ
चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में
थोड़ा-सा आ के फूँक दो, उड़ता नहीं धुआँ
-गुलज़ार
(साभार - उर्दू की बेहतरीन ग़ज़लें, भारतीय ज्ञानपीठ)
गुलज़ार उफ़्फ़! प्यार को कोई ऐसे बयां कर पाएगा?
कमेंट
कमेंट X