मुंबई बम ब्लास्टः जब दहल गया था पूरा देश, क्या था अबु सलेम का प्लान
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12 मार्च 1993 में हुए मुंबई सीरियल ब्लास्ट के आरोपियों में से एक याकूब मेनन को फांसी की सजा मिली थी। इस सजा के लिए याकूब की ओर राष्ट्रपति, महाराष्ट्र के राज्यपाल और सुप्रीम कोर्ट में तक कई बार कानूनी दावों-पेंचों के सहारे बचने का प्रयास किया गया लेकिन उसे हर जगह से निराशा हाथ लगी।
राष्ट्रपति की ओर से फांसी को लेकर दी गई दया याचिका के खारिज होने के बाद याकूब के वकीलों में सुप्रीम कोर्ट में एक बार क्यूरेटिव पिटीशन(उपचार याचिका) दायर की गई थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच ने सुनवाई से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने याकूब को जारी डेथ वरंट को भी ठीक बताया जिसमें 30 जुलाई को सुबह सात बजे फांसी देने की बात कही गई थी। लेकिन सवाल ये है कि 1993 सीरियल ब्लास्ट क्यों हुए थे और किसने रची थी मुंबई को दहलाने की साजिश?
अगर कोई सीधे तौर पर कहे कि मार्च 1993 में हुए सीरियल बम धमाके दिसंबर 1992 में हुई बाबरी विध्वंस का बदला लेने के लिए कराए गए थे तो शायद ही किसी को यकीन हो। लेकिन कुख्यात अपराधी अबु सलेम से मिलकर उसकी रंगीन जिंदगी पर किताब लिख चुके प्रसिद्ध अपराध लेखक एस. हुसैन जैदी की मानें तो 1993 में हुए ब्लास्ट बाबरी विध्वंस के बदले में किए गए थे। एस हुसैन जैदी अबु सलेम समेत कई बड़े अपराधियों से भी मुलाकात कर चुके हैं।
एस. हुसैन जैदी ने अबु सलेम की जिंदगी पर लिखी किताब 'मैं अबु सलेम बोल रहा हूं' में लिखा है कि 1993 में हुए सीरियल धमाके करीब साढ़े चार सौ साल पुरानी बाबरी मस्जिद को कुछ कट्टरपंथियों द्वारा गिरा दिया गया था जिसके बाद अब मुंबई सहित देश के कई शहरों में दंगे हुए थे।
इन दंगों के बारे में डॉन अबु सलेम और डॉन दाऊद सहित तमाम बड़े अपराधियों को यह जानकारी थी कि इनमें सिर्फ मुसलमान भाइयों का ही खून बहा है, जबकि दंगों में हिंदू भी मारे गए थे। दंगों के बाद लोग कहते थे कि दाऊद इतना बड़ा डॉन होने के बाद भी अपने धर्म के लोगों की दंगों से रक्षा नहीं कर सका। यहां तक की इस बात को लेकर डी कंपनी के लोगों में भी आपसी मतभेद होने लगे थे। जिसके बाद दाऊद ने अपने सिपहसालारों से सलाह लेकर दंगों में बहे मुसलमानों के खून का बदला लेने के लिए तैयार किया।
दाऊद बाबरी मस्जिद गिराने के बाद हुए दंगों में मारे गए मुसलमानों का बदला लेने के लिए किसी बड़े साथी के तलाश में था तो पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई भी इसी जुगत में थी कि भारत का कोई ऐसा आदमी उसे मिले जो उसकी योजनाओं को अंजाम तक पहुंचा सके जैसा की वो कश्मीर मसले पर करता रहा है।
दाऊद ने आईएसआई से संपर्क किया तो उसे हथियार और विस्फोटक और लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए तैयार हो गया। चूंकि दाऊद इस दौरान दुबई में बस चुका था तो मुंबई में उसका काम अबु सलेम और कुछ अन्य लोग देख रहे थे। टाइगर मेमन भी मुंबई में चांदी और सोना का बड़ा तस्कर बन चुका था तो वो भी दाऊद के लिए कुछ करके उसका भरोसा जीतना चाहता था।
दाऊद ने मुंबई में धमाके करने की जिम्मेदारी टाइगर मेमन को सौंपी और खुद मुंबई के एक बंदरगाह तक विस्फोटक और हथियार पहुंचाने के जरूरी इंतजाम किए। बताते हैं कि टागर मेमन दुबई से एक जहाज में आठ टन आरडीएक्स, हजारों हथगोले और हथियार भरकर 19 फरवरी 1993 में मुंबई पहुंचा। इसके बाद यहां 19 लोगों की एक टीम के जरिए पूरे शहर को धमाकों से दहलाने की साजिश रची गई।
इस साजिश के तहत 12 मार्च 1993 में शहर के प्रमुख स्थानों, इमारतों खासकर, मुंबई स्टॉक एक्सचेंज, शिवसेना भवन, डाकघर, एयरपोर्ट, एयर इंडिया भवन और सिनेमा घरों और प्रमुख बाजारों खासकर उन स्थानों में जहां पर हिंदू आबादी ज्यादा थी बम लगाए गए। इसके बाद एक बाद एक-एक कर पूरे शहर भर में ब्लास्ट हुए जिसमें आधिकारिक तौर पर 257 लोगों की मौत और 700 लोग घायल हुए थे।
एस हुसैन जैदी ने लिखा है कि पूरे शहर को दहलाने की रणनीति में अबु सलेम भी शामिल था लेकिन वह कानून के लंबे हाथों से बच निकला था।