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Hindi News ›   India News ›   ISRO to launch communication satellite on May 5

पड़ोसी देशों के लिए कल इसरो रचेगा इतिहास, पाकिस्तान को नहीं मिलेगा फायदा

Thu, 04 May 2017 09:53 AM IST
amarujala.com, Presented By: अजय कुमार सिंह
amarujala.com, Presented By: अजय कुमार सिंह Updated Thu, 04 May 2017 09:53 AM IST
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ISRO to launch communication satellite on May 5
GSLV-F09 - फोटो : ISRO

भारत कल साउथ एशिया सैटेलाइट का प्रक्षेपण करने जा रहा है। इस सैटेलाइट से पाकिस्तान को छोड़ कर दक्षिण एशिया के सभी देशों को लाभ होगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, संचार उपग्रह (जीसैट-9) का प्रक्षेपण 5 मई को जीएसएलवी-09 रॉकेट द्वारा श्रीहरिकोटा के अंतरिक्ष उड़ान स्थल से किया जाएगा। इस उपग्रह का उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के बीच संपर्क, संचार और आपदा सहायता उपलब्ध कराना है। 

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमैन ए एस किरण कुमार ने कहा कि पाकिस्तान इस संचार उपग्रह के प्रोजेक्ट में शामिल नहीं होना चाहता था। उसे छोड़कर इस परियोजना में दक्षिण एशिया के सभी देश शामिल हैं। यह सैटेलाइट 12 वर्ष से ज्यादा के मिशन जीवन के लिए डिजाइन किया गया है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सार्क सम्मेलन के दौरान इस सैटेलाइट के बारे में घोषणा करते हुए इसे पड़ोसियों को भारत का तोहफा बताया था। पहले इस सैटेलाइट का नाम सार्क सैटेलाइट रखने की योजना थी। लेकिन इस परियोजना में पाकिस्तान के शामिल नहीं होने की वजह से इसका नाम साउथ एशिया सैटेलाइट रखा गया।  
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भारत की इस स्पेस नीति के पीछे कई दांव हैं। चूकि चीन स्पेस डिप्लोमेसी के जरिए कई देशों के लिए सैटेलाइट 2007 से ही बना रहा है और उसे लॉन्च भी किए हैं।

इस सेटेलाइट के बारे में जानिए सबकुछ

ISRO to launch communication satellite on May 5
इसरो - फोटो : Getty Images

पांच मई को अंतरिक्ष में नए कीर्तिमान स्थापित करने को तैयार SAS की कुल लागत 235 करोड़ है, जिसे 3 सालों की मेहनत के बाद तैयार किया गया है। इस सेटेलाइट का वजन 2230 किलोग्राम है। ये मुख्यरूप से एक संचार उपग्रह है, जो कि दक्षिण एशिया के देशों के लिए खास सहूलियत देने जा रहा है। SAS की ये खास बात है कि इसके लिए भारत किसी भी सहयोगी देश से किसी भी प्रकार का कोई खर्चा नहीं लेगा।
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पांच मई को 412 टन और 50 मीटर लंबाई का एक रॉकेट श्रीहरिकोटा से दक्षिण एशिया उपग्रह को अंतरिक्ष में लेकर जाएगा। इस उपग्रह की मदद से सहयोगी देशों को एक हॉटलाइन मुहैया करवाने की सुविधा है। ये क्षेत्र भूकंप, सुनामी, चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए एक संवेदनशील है। ऐसे में ये उपग्रह इन देशों के बीच संचार कायम करने में मददगार साबित होगा।

नेपाल, भूटान, मालदीव, बांग्लादेश और श्रीलंका इस मिशन में अभी सहयोगी देश हैं वहीं अफगानिस्तान जल्द ही इस परियोजना से जुड़ने जा रहा है। पाकिस्तान को छोड़कर (पाकिस्तान इस योजना में शामिल नहीं) बाकी सारे सार्क देश इस उपग्रह की सुविधा का लाभ ले सकेंगे।

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