Film Review: 'मंटोस्तान' की कहानी में बहुत कच्चापन
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-निर्देशकः राहत काजमी
-सितारेः शोएब निकश शाह, सोनल सहगल, रघुबीर यादव, तारिक खान, वीरेंद्र सक्सेना
रेटिंग *
आप बेहतरीन किस्सागो सआदत हसन मंटों (1912-1955) के मुरीद हैं तो निर्देशक राहत काजमी की मंटोस्तान बेहद निराशा से भर देगी। अगर आप मंटो को कम-ज्यादा या नहीं भी जानते तो फिल्म उनकी कहानियों का सही तर्जुमा पेश नहीं करती। बेहतर है कि मंटो को कैमरे की इस नजर से देखने के बजाय उनकी कलम से ही महसूस किया जाए।
जम्मू के रहने वाले राहत काजमी ने मंटो की चार (खोल दो, ठंडा गोश्त, असाइनमेंट, आखिरी सैल्यूट) कहानियों का कोलाज फिल्म में तैयार किया है परंतु इसमें कहानियों का रंग-रूप, नोक-पलक खो गई हैं। फिल्म 1947 के दर्दनाक देश विभाजन की तस्वीर मंटो की कहानियों के माध्यम से पर्दे पर लाने की कोशिश है लेकिन इसमें बहुत कच्चापन है।
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मंटोस्तान में सिनेमा वाली बात नहीं
यह फिल्म टेलीविजन धारावाहिक की चार कड़ियों को संपादित करके एक-दूसरे के साथ मिक्स करने जैसी लगती है। मंटोस्तान में सिनेमा वाली बात नहीं। इसकी कई वजहें हैं। कमजोर निर्देशन के साथ बेअसर अभिनय भी इसमें शामिल है। मंटो की इन कहानियों में ‘खोल दो’ एक पिता द्वारा अपनी उस बेटी की तलाश है, जो दंगों में बिछुड़ गई है। जबकि ‘ठंडा गोश्त’ में दंगों के दौरान लूट और कत्ल करने वाला एक इंसान खुद कल्पनातीत हादसे का शिकार हो जाता है।
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असाइनमेंट’ दंगों में मानवता के रिश्ते की मौत की कहानी है और ‘आखिरी सैल्यूट’ बचपन में साथ खेले दो ऐसे सैनिकों की दास्तान है, जो भारत- पाकिस्तान के लिए लड़ते हुए आमने-सामने हैं। मूल आइडियों में ही ये कहानियां मनुष्य के दर्द में डूबी हुई हैं। मगर कड़वा सच कहने वाले मंटो की दुनिया की भयावहता, दृश्यों-संवादों में पल-पल आती-जाती सांसें, धड़कन की आवाजें, लाइनों को पढ़कर पैदा होने वाली सिरहन राहत काजमी के द्वारा रचे दृश्यों में नजर नहीं आती।
कहानियों के टुकड़े-टुकड़े कर पेश किया
काजमी की पूरा प्रयास कहानियों की संवेदना को पकड़ने से अधिक 1947 का माहौल बनाने-रचाने का है। वे भूल गए कि मंटो की कहानियां देश की सीमाओं, कैलेंडर की तारीखों और घड़ी के कांटों से दिख रहे समय से आजाद हैं। राहत यह समझ पाते तो दृश्यों में असर होता। निर्देशक ने 1947 को इतना महत्व दिया कि चारों कहानियों के टुकड़े-टुकड़े कर पेश किया है। मंटो जैसे लेखक के साथ ऐसी छूट अपराध से कम नहीं है।
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मंटो को लोकप्रियता के लिए मंटोस्तान जैसे सिनेमा की जरूरत नहीं है। वह हमेशा कहानियों से प्यार करने वालों के दिल में रहे हैं। यह जरूर है कि 2012 में जन्मशती पर कुछ अधिक लोगों का ध्यान उनकी तरफ गया। परंतु 2015 में उनके निधन के 60 बरस पूरे होने के बाद उनका रचनाकर्म रॉयल्टी फ्री हो गया। ऐसा लगता है कि इससे हर किसी को अपने ढंग से उनकी कहानियों में तोड़-फोड़ और हस्तक्षेप की छूट मिल गई है। मंटोस्तान कुछ इसी तरह का काम है।