इस्राइल में 12 साल एक नए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार बनी है। बेंजामिन नेतन्याहू ने वहां इस पद पर रहने का रिकॉर्ड बनाया। आखिरकार उनकी जगह एक ऐसे नेता ने ली है, जिसे एक समय उनका शिष्य समझा जाता था। इस्राइली विश्लेषकों का कहना है कि बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने को सियासत का जैसा खिलाड़ी साबित किया है, उसे देखते हुए इसमें कोई हैरत नहीं होगी, अगर भविष्य में वे फिर कभी वापसी कर लें। फिलहाल, प्रधानमंत्री नफताली बेनेट एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं और उनके सामने अपनी सरकार को टिकाऊ बनाने की कठिन चुनौतियां हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों में यहां ये कयास का विषय है कि अलग-अलग विचारों वाली पार्टियों का नया गठबंधन कब तक टिक पाएगा। इस्राइल में राजनीतिक अस्थिरता का लंबा दौर रहा है। इसके बीच नेतन्याहू ने स्थिरता कायम की थी। अब अंदेशा जताया जा रहा है कि राजनीतिक अस्थिरता का दौर फिर से लौट सकता है। 1949 में इस्राइल की स्थापना के बाद यहां अब 36वीं सरकार बनी है। 72 साल में 36 सरकारें बनने का मतलब है कि इस्राइल में सरकारों का औसत कार्यकाल दो साल का रहा है। गौरतलब है कि इस्राइली संसद नेसेट का तय कार्यकाल चार साल का है।
अब तक सिर्फ दो ऐसी सरकारें बनीं, जिन्होंने अपना चार साल का कार्यकाल पूरा किया। ऐसी आखिरी अखबार 1974 में मेनाखिम बेगिन के नेतृत्व में बनी थी, जो सात साल तक लगातार चली थी। उसमें 1974 से 1978 तक का चार साल का कार्यकाल शामिल था। नेतन्याहू 12 साल तक जरूर प्रधानमंत्री रहे, लेकिन इस दौरान वे चार साल का कोई कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। उनके आखिर दो साल के दौरान तो चार बार नेसेट के चुनाव कराने पड़े।
इस्राइली राजनीति की एक खास पहचान यह भी रही है कि यहां आज तक बनी सभी सरकारें गठबंधन की रही हैं। यानी कभी कोई एक पार्टी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाई। इसकी एक बड़ी वजह इस्राइल की चुनाव प्रणाली है। इस्राइल में चुनाव आनुपातिक प्रणाली के तहत होता है। इस चुनाव में देश भर में हुए कुल मतदान का कम से कम 3.25 फीसदी वोट पाने वाली पार्टी को नेसेट में नुमाइंदगी मिल जाती है। पार्टियों को मिले मतदान प्रतिशत के हिसाब से उनके सदस्यों की संख्या तय होती है। संसद में उनके सदस्य कौन होंगे, यह चुनाव पार्टी की राष्ट्रीय सूची से होता है।
विश्लेषकों का कहना है कि विखंडित राजनीति के कारण इस्राइल की राजनीति में नेता का व्यक्तित्व बहुत अहम हो जाता है। प्रधानमंत्री बनना और टिके रहना काफी कुछ अपने करिश्माई शख्सियत से तय होता है। अब सवाल है कि क्या बेनेट ऐसा करिश्मा दिखा पाएंगे? प्रधानमंत्री बनने को उनके करिश्मे का नतीजा नहीं समझा जा रहा है। बल्कि समझा यह जा रहा है कि नेतन्याहू को हटाने पर आमादा दलों ने उन्हें आगे कर अपना सियासी मकसद साधा है। मगर सरकार चले, यह इसी से तय होगा कि बेनेट कितना करिश्मा दिखा पाते हैँ।
नेतन्याहू में ऐसा करिश्मा था। यही वजह है कि उनकी लिकुड पार्टी आज भी उनके प्रति वफादार है। नेतन्याहू धुर दक्षिणपंथी और रूढ़िवादी पार्टियों के साथ मजबूत गठबंधन कायम रखने में अभी भी कामयाब हैं। जबकि दक्षिणपंथी यामिना पार्टी के नेता बेनेट के साथ दिक्कत यह है कि उनके गठबंधन में कई मध्यमार्गी पार्टियां और एक अरब आबादी समर्थक पार्टी भी शामिल है। मंसूर अब्बास की रा’म पार्टी के विचार बेनेट के अपने विचारों के बिल्कुल उलट हैँ।
जानकारों का मानना है कि यह अस्थिरता का स्रोत हो सकता है। 120 सदस्यीय नेसेट में नेतन्याहू के साथ अभी भी 52 सदस्यों का समर्थन है। नेतन्याहू इस सरकार को ना चलने देने को लेकर अडिग हैँ। ऐसे में यह साफ है कि बेनेट को लगभग रोज ही अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।