विश्लेषकों की राय पर आधारित वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने की कोशिश में उदार रुख अपनाया, तो आईएस-के को अपने पांव फैलाने का मौका मिल सकता है। तब वह ये दावा कर सकता है कि अब वही देश में अमेरिका विरोधी एकमात्र संगठन है। विश्लेषकों के मुताबिक ये भी संभव है कि आईएस-के सीधे तालिबान से टकराव मोल ना ले और रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों में उग्रवादी गतिविधियों में शामिल होने पर ज्यादा ध्यान दे।
कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय तालिबान का आकलन इसी आधार पर करेगा कि वह अल-कायदा से कैसे निपटता है और आईएस-के से पैदा होने वाले खतरों का मुकाबला करने में कितना सफल रहता है।
खबरों के मुताबिक आईएस-के ने हाल में आतंकवादियों के हक्कानी नेटवर्क के साथ एक समझौता किया। हक्कानी नेटवर्क बहुत पुराना आतंकवादी गुट है। बताया जाता है कि फिदायीन हमलों की शुरुआत इसी गुट ने की थी। हक्कानी गुट पिछले 20 साल के दौरान अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) सेना के साथ-साथ तालिबान से भी लड़ता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक आईएस-खोरासान के प्रति देश के उत्तरी इलाकों के नौजवानों में काफी आकर्षण है। खासकर ताजिक और उज्बेक समुदायों में इस गुट का प्रभाव है। इसीलिए आशंका यह है कि अगर ये गुट सक्रिय हुआ, तो ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान जाने वाले शरणार्थियों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि आईएस-के का ‘वैश्विक एजेंडा’ रूस सहित अफगानिस्तान से जुड़े सभी पक्षों के लिए गहरी चिंता का विषय है। आईएस-के सीरिया में उसके खिलाफ लड़ाई में रूस की भूमिका से खफा है। इसलिए अब वह रूस को निशाना बना सकता है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक यही वजह है कि अफगानिस्तान के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के विशेष प्रतिनिधि जमीर काबुलोव ने तालिबान की सफलता को अच्छी खबर बताया है। रूस को अब उम्मीद है कि तालिबान की सरकार बनने से आईएस-के सहित कई दूसरे चरमपंथी गुटों के लिए मुश्किल होगी, जिनका एजेंडा मध्य एशिया या ईरान या रूस में आतंक फैलाना है।