यह जानना अहम है कि स्वांते पैबो आखिर हैं कौन? ज्यादातर लोगों को यह साफ नहीं है कि यह रिसर्च थी किस बारे में? और इसमें ऐसा क्या है, जिससे पैबो को यह पुरस्कार मिला? आइये जानते हैं...
शरीर क्रिया विज्ञान और चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार का एलान हो गया है। इस साल स्वीडन के वैज्ञानिक स्वांते पैबो को इस सम्मान से नवाजा गया है। नोबेल कमेटी के सचिव थॉमस पर्लमैन ने इसका एलान करते हुए कहा कि पैबो को आधुनिक इंसानों और उनकी सबसे करीबी विलुप्त प्रजातियों के जीनोम पर रिसर्च के लिए यह सम्मान दिया गया है। पैबो को 1 करोड़ स्वीडिश क्रोनर (करीब 9 लाख डॉलर) दिए जाएंगे।
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स्वांते पैबो आखिर हैं कौन? उनकी रिसर्च किस बारे में थी? इसमें ऐसा क्या है, जिससे पैबो को यह पुरस्कार मिला? आइये जानते हैं...
पहले जानें- कौन हैं स्वांते पैबो?
स्वांते पैबो का जन्म स्वीडन के स्टॉकहोम में हुआ। उनकी मां एस्टोनिया की लोकप्रिय केमिस्ट कैरिन पैबो हैं। उनके पिता भी प्रसिद्ध बायोकेमिस्ट सुने बर्गस्ट्रॉम हैं, जिन्हें 1982 में बैंग्ट आई सैमुअलसन और जॉन आर वेन के साथ साझा तौर पर चिकित्सा के नोबेल से सम्मानित किया गया था। स्वांते पैबो ने 1986 में उपसला यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। उनके रिसर्च का विषय ई19 प्रोटीन और एडिनोवायरस से जुड़ा था, जो कि इंसानों की प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
स्वांते पैबो।
- फोटो : Social Media
पैबो की रिसर्च किस बारे में है?
पैबो को पैलियोजेनेटिक्स के संस्थापकों में से एक माना जाता है। पैलियोजेनेटिक्स का मतलब प्राचीन जीवों के संरक्षित रखे गए जेनेटिक मैटेरियल (अनुवांशिक पदार्थों) के जरिए हमारे इतिहास का अध्ययन है। पैबो ने इंसानों की शुरुआती प्रजातियों और मौजूदा इंसानों के जेनेटिक्स पर रिसर्च की है और इनके बीच संबंधों को खोजने का काम किया है। 1997 में पहली बार पैबो और उनके साथियों ने निएनडर्थल्स (मनुष्यों की सबसे प्राचीन प्रजातियों में से एक) के डीएनए की सफलतापूर्वक सीक्वेंसिंग की थी।
2006 में पैबो ने एलान किया था कि उनकी रिसर्च का केंद्र निएनडर्थल्स होंगे। वे और उनकी टीम निएनडर्थल्स के जीनोम की पूरी संरचना करेंगे। गौरतलब है कि मनुष्यों की यह प्राचीन प्रजाति मुख्यतः मध्य पूर्व के कुछ क्षेत्रों से लेकर यूरोप तक पाई जाती थीं। उन्हें 2007 में टाइम्स के 100 सबसे प्रभावी लोगों की सूची में शामिल किया गया था। पैबो ने अपनी पूरी रिसर्च में निएनडर्थल्स के जीनोम को लेकर कई रिसर्च कीं।
स्वांते पैबो
- फोटो : Social Media
पैबो की रिसर्च में ऐसा क्या, जिससे उन्हें नोबेल मिला?
पैबो को यह नोबेल सिर्फ निएनडर्थल्स पर रिसर्च के लिए नहीं मिला है, बल्कि उन्होंने इन रिसर्च के जरिए इस बात के सबूत मुहैया कराए हैं कि इंसानों की आगे की प्रजातियां कैसे अस्तित्व में आईं। उनकी दी गई थ्योरी के मुताबिक, ठंडे क्षेत्रों में पाए जाने वाले निएनडर्थल्स और यूरेशियन प्रजातियों के बीच संबंध स्थापित हुए थे। लेकिन निएनडर्थल्स का घुलना-मिलना सहारा में पाई जाने वाली इंसानों की प्रजाति से नहीं हुआ। 2014 में इसे लेकर पैबो ने किताब भी प्रकाशित की।
पैबो को जिस रिसर्च के लिए अवॉर्ड दिया गया है, वह जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख और लिपजिग स्थित मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट में की गई थी। पैबो की रिसर्च में बताया गया है कि कैसे प्राचीन इंसानों के जीनोम में बदलाव आए और मौजूदा मानवजाति अपने पूर्वजों से कितनी अलग है। उनकी स्टडीज में डेनिसोवा नाम की एक प्रजाति का भी पता चला। पैबो की रिसर्च में बताया गया है कि आधुनिक इंसानों में अभी भी पूर्वज निएनडर्थल्स और डेनिसोवन्स के अनुवांशिक गुण मौजूद हैं।
नोबेल प्राइज कमेटी ने उनकी इस उपलब्धि की जानकारी देते हुए कहा कि पैबो ने जिन अनुवांशिकताओं के फर्क का खुलासा किया है, वही जीवित मनुष्यों को विलुप्त हो चुके पूर्वजों से अलग करता है। उनकी यही खोज हमें यह पता लगाने के लिए प्रेरित करती है कि क्यों मनुष्य प्रजाति अद्वितीय है।