तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला गनी बरादर का 2019 में इस्लामाबाद में स्वागत करते पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी।
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अफगानिस्तान में तालिबान के उभार के पीछे पाकिस्तान का बड़ा हाथ माना जाता है। खासकर अमेरिका के अफगानिस्तान से लौटने के ऐलान के बाद जिस तरह पाकिस्तान सरकार ने अपनी पनाह में रखे गए तालिबानी नेताओं को एक के बाद एक रिहा करना शुरू किया, इससे यह बात काफी हद तक साबित भी हो जाती है। पाकिस्तान की कैद से छोड़े गए बड़े नेताओं में एक नाम मुल्ला बरादर का भी है, जिसे आगे तालिबान के नेतृत्व में बनने वाली सरकार का अघोषित प्रमुख भी करार दिया जा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के समर्थन वाले किसी नेता के अफगानिस्तान की सत्ता में आने से भारत पर इसके असर और क्षेत्र में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी चर्चाएं जारी हैं। अमर उजाला के इस एक्सप्लेनर में समझिए तालिबान का भारत और पाकिस्तान पर असर...
तालिबान के उभार में पाकिस्तान का अहम किरदार
1994 में जब अफगानिस्तान में जारी गृहयुद्ध के बीच रूस के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहिद्दीनों का संगठन 'तालिबान' सामने आया, तो उसके सदस्यों को पहले ही पाकिस्तान का समर्थन हासिल था। 1996 में अफगानिस्तान पर नियंत्रण पाने के दौरान भी पाकिस्तान ने तालिबान को हथियारों के साथ जरूरी मदद देना जारी रखा। इसकी एक वजह यह थी कि मुजाहिद्दीनों के जरिए ही पाकिस्तान 1980 के दशक में रूस के खिलाफ अमेरिका की मदद कर रहा था। बाद में इन्हीं मुजाहिद्दीनों के प्रभाव से पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को अपना प्रभाव कायम करना जारी रखा।
2001 में अमेरिका के अफगानिस्तान में घुसने और तालिबान के सत्ता से बेदखल होने के बाद भी पाकिस्तान ने पीछे से संगठन के बड़े नेताओं का समर्थन जारी रखा। इन सालों में पाकिस्तान ने तालिबान के संस्थापक नेता मुल्ला उमर से लेकर अब्दुल गनी बरादर तक को पनाह दी। बरादर को 2010 में पाकिस्तान ने हिरासत में लेने के बाद सालों तक जेल में रखने की बात कही। हालांकि, 2018 में ट्रंप के तालिबान से बातचीत शुरू करने की बात सामने आते ही, पाक ने बरादर को रिहा कर दिया और उसे अफगान सरकार, अमेरिका और तालिबान के बीच होने वाली बातचीत का अहम हिस्सा बना दिया। मौजूदा तालिबानी नेतृत्व में बरादर की हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके अफगानिस्तान की सरकार में अगले राष्ट्रपति होने तक के कयास लगाए जा रहे हैं।
खुद पाकिस्तान भी मौजूदा समय में तालिबान के साथ अपने रिश्तों को लेकर खुलकर सामने आ गया है। हाल ही में प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि अफगानिस्तान ने गुलामी की जंजीरों को तोड़ दिया है। इतना ही नहीं पाक सरकार के कुछ और मंत्रियों ने भी खुलकर तालिबान के समर्थन की बात कही है।
पाकिस्तान ने कैसे की तालिबान की अफगानिस्तान जीतने में मदद?
अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के साथ ही तालिबान ने अलग-अलग प्रांतों में अफगान सेना के खिलाफ हमले शुरू कर दिए। हालांकि, एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि ज्यादातर प्रांतों में तालिबान ने बिना कोई बड़ी लड़ाई लड़े ही नियंत्रण हासिल कर लिया। अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह और गनी सरकार के कई सदस्यों का आरोप है कि पाकिस्तान की स्पेशल फोर्सेज और आईएसआई ने ही तालिबान की अफगानिस्तान में नियंत्रण पाने में मदद की।
पिछले महीने ही इमरान खान कैबिनेट के एक मंत्री शेख राशिद ने स्थानीय न्यूज चैनल को बताया था कि अफगान तालिबान के घायल लड़ाकों का पाकिस्तान के अस्पतालों में इलाज चल रहा है और कई बार मारे गए लड़ाकों को पाकिस्तान में ही उनके पैतृक घरों के पास दफनाया जाता है।
छद्म नियंत्रण के लिए तालिबान का समर्थन?: पिछले तीन दशकों में पाकिस्तान ने लगातार तालिबान का समर्थन जारी रखा है। माना जाता है कि तालिबान के जरिए पाकिस्तान अपनी सेना के लिए अफगानिस्तान में अहम ठिकाने पाना चाहता है, जिसके जरिए वह भारत की ओर से किसी भी कार्रवाई का जवाब दे सके। इसके साथ ही वह अफगानिस्तान से होकर गुजरने वाले कई अहम मध्य एशिया के मार्गों पर भी नियंत्रण पाने की कोशिश में है।