ट्रंप ने रूस पर लगाया टैरिफ तो किन-किन देशों पर कैसे होगा असर?
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा है कि अगर रूस और यूक्रेन का संघर्ष खत्म नहीं हुआ तो वे रूस पर कड़े टैरिफ लगाएंगे। उन्होंने इसे सेकेंडरी टैरिफ बताया। सेकेंडरी टैरिफ का सीधा अर्थ है वह टैरिफ जो निशाने पर रखे गए देश पर नहीं, बल्कि उसके सहयोगियों पर लगाया जाए। यानी यह टैरिफ अमेरिका उन देशों पर लगाएगा, जो रूस से व्यापार कर रहे होंगे।
माना जा रहा है कि अमेरिका अपने इस फैसले के जरिए रूस के व्यापार की सभी लाइफलाइन बंद करने की तैयारी कर रहा है। पहले ही अमेरिका और यूरोप के कई देशों ने रूस पर व्यापार से जुड़े प्रतिबंध लगाए हैं। उधर अब अमेरिका उन देशों को भी रूस से व्यापार करने से रोकने की तैयारी कर रहा है, जिनके रूसी सरकार से परंपरागत तौर पर अच्छे रिश्ते रहे हैं। इनमें भारत, चीन, ब्राजील, तुर्किये, वियतनाम और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देश शामिल हैं।
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अमेरिका ने रूस पर लगाए टैरिफ तो भारत पर कैसा-कितना असर?
रूस से व्यापार कर रहे देशों के उत्पाद पर अमेरिका टैक्स लगाने की बात कर रहा है। इसके दो परिणाम हो सकते हैं...
- पहला- अमेरिका में अपने उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगने के डर से यह देश रूस से व्यापारिक रिश्ते तोड़ लें और उससे आयात-निर्यात बंद करें।
- दूसरा- यह देश रूस से व्यापार जारी रखें और अमेरिका में इनके उत्पाद ज्यादा टैरिफ लगने की वजह से महंगे बिकें। इससे इन देशों को अमेरिका में घाटा हो।
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गौरतलब है कि भारत लंबे समय से अमेरिका और रूस दोनों से व्यापार में संतुलन रखकर चलता आया है। अपने ऐतिहासिक रिश्तों की वजह से भारत लंबे समय से हथियारों के लिए रूस पर निर्भर रहा है। दूसरी तरफ 2022 में रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से भारत ने रूस से तेल का आयात भी बढ़ाया है। मौजूदा समय में रूस से सबसे ज्यादा तेल आयात करने वाले देशों में चीन और भारत सबसे ऊपर हैं। व्यापार के पूरे आंकड़ों को देखा जाए तो भारत और रूस ने 2024-25 में कुल 68.7 अरब डॉलर का कारोबार किया। इस दौरान जहां भारत का कुल निर्यात 4.88 अरब डॉलर का रहा वहीं, आयात 63.84 अरब डॉलर का रहा।
भारत जिन चीजों को रूस को निर्यात करता है, उनमें कृषि क्षेत्र के उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स (दवाएं), लोहा और स्टील, हवाई जहाज के पार्ट्स, मशीनें, कपड़े, चमड़ा, रबड़, सर्जिकल टूल्स, आदि शामिल हैं। दूसरी तरफ भारत रूस से जो उत्पाद आयात करता है, उनमें सबसे बड़ा हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े उत्पाद- तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, फर्टिलाइजर, मिनरल ईंधन, मशीनें, धातुएं और खाद्य तेल का है। इसके अलावा भारत बड़ी मात्रा में हथियारों का भी आयातक रहा है।
भारत के किन-किन क्षेत्रों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर
1. ऊर्जा क्षेत्र
2023 के आंकड़ों के मुताबिक चीन और भारत ने समुद्री मार्ग से रूस से इतना तेल आयात किया, जितना पूरे यूरोपीय संघ के देशों ने नहीं किया। इस दौरान रूस के कुल तेल निर्यात का 85-90 फीसदी हिस्से के खरीदार चीन और भारत ही रहे। भारत ने इस पूरी अवधि में हर दिन 16 लाख से 17 लाख बैरल प्रति दिन तेल रूस से खरीदा। यह भारत की प्रतिदिन की तेल की जरूरत का 35 फीसदी है। भारत अपने तेल का बाकी हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से खरीदता है।
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भारत की तरफ से रूसी तेल पर निर्भरता बढ़ने की एक वजह रूस की तरफ से दी जाने वाली छूट है। आंकड़ों के मुताबिक, रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से रूस ने भारत को 60 डॉलर प्रति बैरल से भी कम कीमत पर तेल मुहैया कराया है, जो कि यूरोपीय संघ की ओर से तय न्यूनतम कीमत से भी कम है। इसके चलते भारतीय तेल रिफाइनरीज को सस्ता तेल खरीदने में फायदा होता है। रूस के पक्ष में जाने वाली एक और बात यह भी है कि रूस का कच्चा तेल हल्का और सल्फर युक्त होता है, जो कि भारत के उद्योगों के लिए उपयुक्त माना जाता है, जबकि अमेरिका और पश्चिमी देशों का तेल कम सल्फर वाला होता है, जो कि भारत के रिफाइनिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिहाज से नहीं है।
ऐसे में अगर अमेरिका ने रूस से व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ लगाने का एलान किया तो भारत को तेल के आयात में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
जहां भारत की थलसेना रूस की एके-203 बंदूकों से लेकर उसके टैंकों (टी-90, टी-72) और बख्तरबंद वाहनों का अहम सप्लायर है तो वहीं वायुसेना के अधिकतर विमान- मिग, सुखोई भी रूस द्वारा निर्मित हैं। इसके अलावा एमआई-17 हेलीकॉप्टर भी रूस से ही आयात किए जाते हैं। नौसैन्य क्षेत्र में रूस ने भारत को कई सबमरीन से लेकर जहाज तक मुहैया कराए हैं। इसके अलावा जरूरी उपकरणों में रूस से भारत को एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, रडार, मिसाइलें भी मिली हैं। भारत की ब्रह्मोस मिसाइल के पीछे भी रूस का अहम किरदार रहा है।
अमेरिका के टैरिफ से बाकी देश कैसे परेशान होंगे?
ट्रंप ने अगर रूस से व्यापार कर रहे देशों को टैरिफ की जद में लिया तो इसका असर अलग-अलग महाद्वीपों पर मौजूद उसके करीबी देशों पर पड़ेगा।
- यूएई: पश्चिम एशिया में संयुक्त अरब अमीरात अमेरिका और रूस दोनों के लिए ही अहम केंद्र है। यूएई ऊर्जा क्षेत्र में रूस का प्राथमिक खरीदार नहीं है, लेकिन यह रूसी नागरिकों की संपत्ति और उसके मुद्रा व्यापार में अहम भागीदारी रखता है। रूस ने कुछ समय पहले ही यूएई के डिरहम को कारोबार में वैकल्पिक मुद्रा बनाया है।
- तुर्किये: रजब तैयब अर्दोआन के शासन वाला तुर्किये नाटो का सदस्य होने के बावजूद रूस के साथ बेहतरीन रिश्ते रखता है। तुर्किये ने भी रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से उससे कच्चे तेल और प्राकृतिक गैसों का आयात बढ़ाया है। इतना ही नहीं तुर्किये ने भी भारत की तरह रूस से एस-400 डिफेंस सिस्टम खरीदे हैं। इसे लेकर अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध भी लगाए थे।