अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने तकनीक के पांच खास क्षेत्रों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। इन अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे उन्नत तकनीकों में अमेरिका की बढ़त बनाए रखने के इंतजाम करें। जिन पांच तकनीकों की पहचान इन अधिकारियों ने की है, उनके बारे में माना जाता है कि आने वाले दशकों में दुनिया पर किसका वर्चस्व होगा, वह इनमें हासिल की गई दक्षता से ही तय होगा।
अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के मुताबिक ये पांच तकनीक हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायो-टेक्नोलॉजी, सेमी कंडक्टर्स, और ऑटोनोमस सिस्टम्स। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के लिए इन क्षेत्रों में बढ़त बनाए रखने की पहल करना इसलिए जरूरी हो गया है, क्योंकि चीन और रूस ने इनमें महारत हासिल करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। खुफिया अधिकारियों ने इन क्षेत्रों का अध्ययन करने के बाद एक दस्तावेज दैयार किया है। इसमें चेतावनी दी गई है कि अमेरिका से इन तकनीकों में आगे निकलने के लिए चीन और रूस ‘कानूनी और गैर-कानूनी तरीकों’ का इस्तेमाल कर रहे हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में इस दस्तावेज में कहा गया है कि चीन के पास अगले एक दशक में अमेरिका को पीछे छोड़ देने की ताकत और महत्वाकांक्षा है। उससे चीन की साइबर हमले करने और ‘दुष्प्रचार अभियान चलाने’ की क्षमता में भारी बढ़ोतरी हो जाएगी। क्वांटम कंप्यूटिंग के बारे में कहा गया है कि दुनिया के कई देश इसके विकास पर अमेरिका की तुलना में ज्यादा खर्च कर रहे हैं। इस कारण वे अमेरिकी प्रतिभाओं को भी नौकरी पर रखने की बेहतर स्थिति में पहुंच गए हैं। दस्तावेज में कहा गया है कि क्वांटम कंप्यूटिंग पर जिसका भी वर्चस्व होगा, वह दूसरे देशों के आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी संचार को प्रभावित करने की स्थिति में होगा। बायोटेक के बारे में कहा गया है कि हाल के दशकों में इस क्षेत्र में दुनिया में प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। अमेरिकी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जिनोमिक्स के क्षेत्र में सफलता हासिल करने वाले देश निगरानी और सामाजिक दमन में अधिक सक्षम हो सकते हैं।
सेमीकंडक्टर्स के बारे में कहा गया है कि इसके सप्लाई चेन के मौजूदा स्वरूप से ऐसी रुकावटें खड़ी होती हैं, जिसका लाभ दूसरे देश उठा सकते हैं। फिलहाल, सेमीकंडक्टर्स के मामले में अमेरिका पूरी तरह ताइवान की एक कंपनी पर निर्भर है। ऑटोनोमस सिस्टम्स के बारे में बताया गया है कि सैनिक और असैनिक दोनों मकसदों के लिए इनका इस्तेमाल बढ़ रहा है। इससे अधिक गंभीर साइबर हमलों का खतरा पैदा हो रहा है।