इस्राइल-अमेरिका के साझा हमले का ईरान पर पड़ेगा असर।
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इस्राइल और अमेरिका ने संयुक्त अभियान में ईरान पर हमला बोला है। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने भी इस्राइल पर बैलिस्टिक मिसाइलों से पलटवार किया। इतना ही नहीं ईरान ने पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें जॉर्डन से लेकर कुवैत और सऊदी अरब से बहरीन तक में अमेरिकी बेसेज पर हमले किए गए हैं।
इस बीच अमर उजाला ने दो पूर्व-राजनयिकों- दिलीप सिन्हा और दीपक वोहरा से इस ताजा संघर्ष को लेकर चर्चा की और जाना कि आखिर अमेरिका-इस्राइल बनाम ईरान के मुकाबले के क्या मायने हैं? इस संघर्ष की वजह क्या रही है और अब आगे क्या हो सकता है?

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अमेरिका-इस्राइल बनाम ईरान के मुकाबले के मायने
पूर्व राजनयिक दिलीप सिन्हा के अनुसार, यह युद्ध इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पूरी तरह से टूट चुकी है। शीत युद्ध के समय के विपरीत, अब महाशक्तियां यह मानने लगी हैं कि वे कूटनीति के बजाय युद्ध करके अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल कर सकती हैं, जो कि विश्व के लिए एक बहुत खतरनाक स्थिति है। अमेरिका और इस्राइल की ईरान के साथ यह दुश्मनी 1979 के सत्ता परिवर्तन के समय से ही चली आ रही है।
पूर्व राजनयिक दीपक वोहरा के मुताबिक, यह मुकाबला अब फाइट टू द फिनिश बन चुका है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का स्पष्ट मानना है कि ईरान की वर्तमान सरकार नंबर वन स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म (आतंकवाद की सबसे बड़ी प्रायोजक) है और इस आतंकी और कट्टरपंथी सरकार का जाना अब तय है।
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इस संघर्ष में अब आगे क्या हो सकता है?
हवाई युद्ध और आंतरिक विद्रोह: दिलीप सिन्हा के अनुसार, इस युद्ध में थल सेना के जमीन पर उतरने की कोई संभावना नहीं है; यह मुख्य रूप से हवाई हमलों तक सीमित रहेगा। दोनों देशों का लक्ष्य केवल इतना है कि लगातार बमबारी करके वहां इतना दबाव बनाया जाए कि ईरान की जनता खुद अपने नेताओं को उखाड़ फेंके।
ईरान की हार और भारी तबाही की आशंका: दीपक वोहरा का दावा है कि सैन्य ताकत में ईरान कहीं से भी अमेरिका और इस्राइल के सामने नहीं टिकता। अगर ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी बेस पर हमला किया, तो नाटो (NATO) का 'आर्टिकल 5' लागू हो जाएगा, जिसके बाद ईरान का वही हश्र होगा जो लीबिया में गद्दाफी का हुआ था। अगर ईरान ने पंगा लेना जारी रखा, तो उसके सिविलियन और ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी तबाह कर दिया जाएगा, जिससे ईरान की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पूरी तरह ढह जाएगी।
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