द वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक जिन लोगों से बातचीत की गई, उनमें से ज्यादातर की पहचान अमेरिका सरकार ने छिपाने की कोशिश की है। अखबार ने कहा था कि अमेरिका के सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम के तहत तय प्रतिबंधों के कारण उसने उन दस्तावेजों को प्रकाशित नहीं किया। लेकिन उसने पूरे दस्तावेज का सार प्रकाशित किया था। इसके मुताबिक अमेरिकी अधिकारी यह लगातार कहते रहे कि युद्ध में वे आगे बढ़ रहे हैं। जबकि हकीकत इसके विपरीत थी और अधिकारी उस हकीकत को जानते भी थे।
अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इंटरव्यू के दौरान संबंधित व्यक्तियों ने दो टूक बातें कहीं। उन्होंने अपनी शिकायत, असंतोष और असल हालात को बयान किया। मसलन, पूर्व राष्ट्रपतियों जॉर्ज बुश जूनियर और बराक ओबामा के कार्यकाल में अफगानिस्तान से संबंधित मामलों के प्रभारी और थ्री स्टार जनरल रहे डगलस लुटे ने 2015 में कहा- ‘हमारे पास अफगानिस्तान की मूलभूत समझदारी नहीं थी। हमें यही नहीं पता था कि हम क्या कर रहे हैं।’ उन्होंने कहा- अफगानिस्तान में हमारी अकुशलता के बारे में अमेरिकी जनता को मालूम होगा, तो वे कहेंगे कि 2,300 सैनिकों की जान बेकार में चली गई। उसके लिए वे अमेरिकी सरकार और कांग्रेस (सांसद) को दोषी ठहराएंगे। ऐसे में यह बताने का कौन साहस करेगा कि ये जानें निरर्थक चली गईं?
साल 2001 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला, तब से उसके सात लाख 75 हजार सैनिक वहां तैनात किए गए। कई सैनिकों को कई बार वहां भेजा गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक उनमें से लगभग 2,300 की मृत्यु हुई। 20,589 सैनिक जख्मी हुए, जिनमें कई विकलांग हो गए।