अनुसंधानकर्ताओं में एक वॉर्थेर्म्स यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में प्रोफेसर हैं। झांग अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कनसास में पढ़ाते हैं। उन्होंने कहा है- ‘हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की कंपनियां देशभक्ति की भावना से चीन से बाहर चली जाएंगी, इसकी संभावना नहीं है।’
अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ये अध्ययन रिपोर्ट उस समय आई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन चीन के प्रति अमेरिकी नीति की व्यापक समीक्षा कर रहे हैं। इसके तहत डोनाल्ड ट्रंप के दौर में लगाए गए शुल्कों की उपयोगिता की भी समीक्षा की जा रही है।
अमेरिका की वित्त मंत्री जेनेट येलेन ने कुछ समय पहले कहा था कि अमेरिका ने जो नए शुल्क लगाए, वे असल में अमेरिकी उपभोक्ताओं पर लगाए गए टैक्स साबित हुए। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन ने जनवरी 2020 में चीन के साथ जिस व्यापार समझौते पर दस्तखत किए थे, उससे अमेरिका-चीन व्यापार के बीच मौजूद बुनियादी मुद्दों का हल नहीं निकला। ट्रंप प्रशासन के कदमों का नतीजा यह हुआ कि चीन में काम कर रही अमेरिका की 500 बड़ी कंपनियों में से 63 फीसदी पर उसका बुरा असर पड़ा। इसके बावजूद सिर्फ सात फीसदी कंपनियों ने चीन में अपना कामकाज बंद किया।
वॉर्थेर्म्स और झांग ने कहा है कि ट्रेड वॉर का बुरा असर छोटी कंपनियों पर पड़ा। उनमें भी खास कर उन कंपनियों पर जिन्होंने चीन में नया कारोबार शुरू किया था। इसके पहले अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स इन चाइना ने एक सर्वे रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें अमेरिका में कारोबार कर रही 47 फीसदी अमेरिकी कंपनियों ने कहा था कि उनका सर्वोच्च प्राथमिकता यह है कि अमेरिका ने जो शुल्क लगाए थे, उन्हें वापस कराया जाए।