इस खबर से दुनियाभर में सनसनी फैली हुई है कि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की अगली बैठक को नाकाम करने में वे देश जुटे हुए हैं, जिनका जीवाश्म ऊर्जा (फॉसिल फ्यूल) का इस्तेमाल जारी रखने में आर्थिक स्वार्थ है। खास कर इस सिलसिले में सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, और जापान के नाम चर्चित हुए हैं। ऐसे देशों की लॉबिंग को देखते हुए पर्यावरण समर्थक गुटों को अंदेशा है कि संयुक्त राष्ट्र के कॉप-26 (संबंधित पक्षों के 26वें सम्मेलन) में ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के ऊंचे लक्ष्य तय नहीं हो सकेंगे। ये सम्मेलन अगले महीने स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में होना है।
संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर इंटर-गर्वमेंटल (अंतरराष्ट्रीय) कमेटी यानी आईपीपीसी ने चेतावनी दी है कि धरती के तापमान में बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए जरूरी है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती की जाए। ऐसा ना होने पर जलवायु परिवर्तन की समस्या खतरनाक सीमा तक गंभीर हो जाएगी। ऐसा होने के लक्षण अभी से नजर आने लगे हैं।
अब लीक हुए दस्तावेजों से ये सामने आया है कि कई देश कॉप-26 के एजेंडे को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इन दस्तावेजों के मुताबिक विभिन्न देशों की सरकारों की तरफ से 32 हजार से ज्यादा प्रतिक्रियाएं दर्ज कराई गई हैं। उनमें से कुछ प्रतिक्रियाओं में दलील दी गई है कि फॉसिल फ्यूल (पेट्रोलियम, कोयला आदि) के उपयोग की मात्रा में तुरंत कटौती करने की जरूरत नहीं है।
सऊदी अरब की तरफ से पेश दलील में कहा गया है कि कॉप-26 में जो समझौता प्रस्तावित है, उसमें ऐसी बातें शामिल नहीं होनी चाहिए कि इन ऊर्जा स्रोतों का उपयोग घटाने की तुरंत आवश्यकता है। जबकि ऑस्ट्रेलिया के अधिकारियों ने वैज्ञानिकों के इन निष्कर्षों को ठुकराने पर जोर दिया है कि कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद किया जाना चाहिए।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि आईपीसीसी जलवायु परिवर्तन की ताजा हालत पर जो रिपोर्ट तैयार कर रही है कि उसके एक हिस्से को वैज्ञानिकों ने पिछले अगस्त में लीक कर दिया था। ऐसा उन्होंने इसी अंदेशे की वजह से किया था कि विभिन्न देश अपने स्वार्थ के कारण कॉप-26 के लक्ष्यों को नरम रखने की कोशिश करेंगे। इसलिए इन वैज्ञानिकों ने गहरा रहे संकट से दुनिया को समय रहते आगाह करने की कोशिश की। उस रिपोर्ट में कहा गया कि अगर धरती के तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है, तो कोयला और प्राकृतिक गैस से चलने वाले बिजली संयंत्रों को तुरंत बंद करना होगा।
जानकारों का कहना है कि ताजा खुलासे से वैज्ञानिकों की आशंका सच साबित हुई है। इससे सामने आया है कि सऊदी अरब और पेट्रोलियम निर्यातकों के संगठन- ओपेक में शामिल देश धरती के भविष्य पर अपने स्वार्थ को तरजीह दे रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया दुनिया में कोयले के सबसे बड़े निर्यातकों में है। इसलिए वह भी इन देशों के साथ शामिल हो गया है। उन्हें जापान का भी साथ मिल रहा है। जापान में आज भी ज्यादा बिजली संयंत्र फॉसिल फ्यूल पर निर्भर हैं। नॉर्वे और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों ने भी कॉप-26 में ज्यादा महत्वाकांक्षी लक्ष्य न तय करने पर जोर दिया है।