अमेरिका और तालिबान के बीच पिछले साल हुए दोहा शांति समझौते का भविष्य अब अनिश्चित हो गया है। जो बाइडन प्रशासन ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि वह इस समझौते की समीक्षा कर रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि इस समझौते से जो हासिल होने की उम्मीद दोनों पक्षों न की थी, वह पूरी नहीं हुई है। इसलिए पिछले कुछ समय से दोनों तरफ से इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस समझौते के लड़खड़ाने की एक खास वजह यह रही कि तालिबान ने वादे के मुताबिक हिंसा नहीं छोड़ी। उधर अफगानिस्तान सरकार ने भी तालिबान के खिलाफ कार्रवाई जारी रखी। इसकी वजह से अविश्वास का माहौल बना रहा।
अफगानिस्तान मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबान के लिए युद्ध अपना मकसद हासिल करने का एक प्रमुख उपाय बना हुआ है। दूसरी तरफ अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी की सरकार के पास सैनिक कार्रवाई एकमात्र ऐसा उपाय है, जिससे वह तालिबान की देश में अपना कब्जा बढ़ाने की कोशिशों को रोक सकती है। वेबसाइट एशिया टाइम्स से बातचीत में कई विशेषज्ञों ने कहा कि हाल में तालिबान कई इलाकों में सैनिक कामयाबियां हासिल की हैं। इससे बातचीत की मेज पर उसकी स्थिति पहले से मजबूत हुई है।
इन्हीं हालात के कारण बाइडन प्रशासन की तरफ से ये घोषणा की गई है कि वह दोहा समझौते की समीक्षा कर रहा है। इसके पहले अमेरिकी कांग्रेस (संसद) में अफगानिस्तान स्टडी ग्रुप की एक रिपोर्ट पेश हुई, जिसमें अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी सैनिक उपस्थिति में विस्तार करने का सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उचित अमल ना होने के कारण दोहा समझौता मृत्यु शैय्या पर है। ऐसे में अमेरिका को अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुलाने के लिए और भी सख्त शर्तें लगानी चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया- ‘अमेरिका ने सेना वापसी के लिए तय तारीख से पहले ही इस दिशा में कदम उठा लिए। लेकिन तालिबान ने अपने वादे पूरे नहीं किए। तालिबान ने अपनी तरफ से दी गई इस गारंटी पर अमल नही किया है कि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों को की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले गुटों और व्यक्तियों से सहयोग नही करेगा।’ रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अफगान नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ हिंसा जारी है। 2020 में जिस तेजी से हिंसा बढ़ी, उससे ये शक पैदा हुआ है कि क्या तालिबान कभी भी अफगान सरकार के साथ व्यावहारिक राजनीतिक समझौते तक पहुंच पाएगा।
हाल में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इस्लामाबाद में तालिबान के प्रतिनिधियों से बातचीत की। उसके बाद उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में हिंसा घटाने की जिम्मेदारी अकेले तालिबान पर नहीं है। इस बयान को इस बात का संकेत माना गया कि तालिबान ने दोहा समझौते से उम्मीद छोड़ दी है और इस मामले में पाकिस्तान की राय भी उससे मेल खाती है। उधर तालिबान की कई ऐसी हालिया गतिविधियां हैं, जिससे लगता है कि उसने नए सिरे से मोर्चाबंदी शुरू कर दी है।
तालिबान ने ईरान के साथ अपनी पुरानी दुश्मनी खत्म कर दी है। तालिबान प्रतिनिधियों ने हाल में कई बार ईरान की यात्रा की। इसे इस बात का संकेत माना गया है कि तालिबान अमेरिका के खिलाफ किसी प्रकार संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिश में है। ईरान के अमेरिका से लगातार तनावपूर्ण संबंध बने हुए हैं।
कूटनीति विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईरान की अफगान मामलों में दिलचस्पी बढ़ने के संकेत मिले, तो उससे हालत और पेचीदा होंगे। ईरान की कोशिश रही है कि अमेरिकी फौजों की अफगानिस्तान से जल्द से जल्द वापसी हो। लेकिन अमेरिका फिलहाल ऐसा कोई कदम उठाने के मूड में नहीं है, जिससे ईरान पर जारी दबाव घटे।
एशिया टाइम्स ने कहा है कि अफगानिस्तान शांति समझौते की आज जो हालत है, उसे देख कर यही लगता है कि यह शांति के लिए नहीं, बल्कि युद्ध की अपनी-अपनी तैयारियों को मजबूत करने के लिए है। इस समझौते की आड़ में संबंधित पक्ष आगे की तैयारी कर रहे हैँ। ऐसे में लगता कि दो दशक से युद्ध ग्रस्त अफगानिस्तान को जल्द कोई राहत मिलने वाली है।