राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पहले जब कभी ऐसा टकराव हुआ, तब दोनों पार्टियों के मध्यमार्गी नेताओं ने बीच का रास्ता निकाल लिया। लेकिन इस बार सूरत अलग है। दोनों पार्टियों में ध्रुवीकरण इतना तीखा है कि उनमें कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं दिखता। रिपब्लिकन पार्टी का कहना है कि जो बाइडन प्रशासन शाहखर्ची कर रहा है। उसी का नतीजा है कि अमेरिका पर कुल कर्ज लगभग 29 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह अमेरिका की एक साल की जीडीपी का लगभग डेढ़ गुना है।
लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी का कहना है कि रिपब्लिकन पार्टी की ये दलील पाखंड से भरी हुई है। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि पिछले रिपब्लिकन प्रशासन के समय भी कर्ज सीमा बढ़ाई गई थी। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी ने कभी आम सरकारी कामकाज में रुकावट डालने का नजरिया नहीं अपनाया। तब उन्होंने कई बार कर्ज सीमा बढ़ाने के रिपब्लिकन प्रस्ताव का समर्थन किया। इसलिए अब रिपब्लिकन पार्टी को भी वैसा ही रुख अपनाना चाहिए।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपना कर रिपब्लिकन पार्टी असल में राष्ट्रपति जो बाइडन के 3.5 ट्रिलियन डॉलर के सॉफ्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज को रोकना चाहती है। धुर दक्षिणपंथी रिपब्लिकन सीनेटरों की समझ है कि अगर बाइडेन प्रशासन अतिरिक्त कर्ज लेने में नाकाम रहेगा, तो वह इतने भारी खर्च वाली परियोजना को आगे नहीं बढ़ा पाएगा। रिपब्लिकन सीनेटर धनी लोगों पर टैक्स बढ़ा कर अतिरिक्त राजस्व जुटाने की बाइडेन प्रशासन की मंशा में भी रुकावट डाल रहे हैं।
जानकारों के मुताबिक इस गतिरोध की भारी कीमत अमेरिकी जनता और विश्व अर्थव्यवस्था को चुकानी होगी। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि आज की वित्तीय विश्व व्यवस्था अमेरिका की घटनाओं से निकटता से जुड़ी हुई है।