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अमेरिका: सरकारी कर्ज की सीमा बढ़ाने पर गतिरोध, दुनिया पर पड़ सकता है असर

Wed, 29 Sep 2021 07:42 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पहले जब कभी ऐसा टकराव हुआ, तब दोनों पार्टियों के मध्यमार्गी नेताओं ने बीच का रास्ता निकाल लिया। लेकिन इस बार सूरत अलग है। दोनों पार्टियों में ध्रुवीकरण इतना तीखा है कि उनमें कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं दिखता...
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अमेरिकी डॉलर - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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अमेरिका में कर्ज सीमा को लेकर जारी गतिरोध ने गंभीर रूप ले लिया है। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों के बीच इस मुद्दे पर जारी मतभेद का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। अमेरिका में तो अगले 18 अक्तूबर के बाद सारा सरकारी कामकाज ठप हो जाने का अंदेशा है। सरकार के कर्ज ले सकने की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव कांग्रेस (संसद) के सामने है। लेकिन रिपब्लिकन पार्टी ने इस प्रस्ताव को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है।

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अमेरिका सरकार का कर्ज हाल में बढ़ा है। जानकारों के मुताबिक ऐसा राजस्व से ज्यादा खर्च करने के कारण हुआ है। पिछले कर्ज को चुकाने के लिए सरकार को नए कर्ज की जरूरत है। इसलिए अगर सीनेट में कर्ज सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव अगर 18 अक्तूबर के पहले पारित नहीं हुआ, तो अमेरिका सरकार डिफॉल्ट करने (मतलब तय समय सारणी के मुताबिक ब्याज और मूल धन को ना चुका पाने) की हालत में पहुंच जाएगी। तब सेना सहित सरकारी कर्मचारियों को वेतन और रिटायर कर्मचारियों की पेंशन देने लायक पैसा भी उसके पास नहीं बचेगा।

वित्त बाजार के जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिकी सरकार डिफॉल्ट करने की स्थिति में पहुंची, तो सरकार ने पहले से जो कर्ज ले रखा है, उस पर उसे अधिक दर से ब्याज देना होगा। उसका परिणाम यह भी होगा कि वित्तीय बाजार में ब्याज दर बढ़ जाएगी। उससे मकान, कार, क्रेडिट कार्ड आदि जैसे कर्ज भी महंगे हो जाएंगे। अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन के विश्लेषकों का कहना है कि कर्ज डिफॉल्ट की स्थिति में महामारी से उबर रही अर्थव्यवस्था के लिए नया संकट खड़ा हो जाएगा। उससे लाखों लोगों की नौकरियां जा सकती हैं।

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पहले जब कभी ऐसा टकराव हुआ, तब दोनों पार्टियों के मध्यमार्गी नेताओं ने बीच का रास्ता निकाल लिया। लेकिन इस बार सूरत अलग है। दोनों पार्टियों में ध्रुवीकरण इतना तीखा है कि उनमें कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं दिखता। रिपब्लिकन पार्टी का कहना है कि जो बाइडन प्रशासन शाहखर्ची कर रहा है। उसी का नतीजा है कि अमेरिका पर कुल कर्ज लगभग 29 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह अमेरिका की एक साल की जीडीपी का लगभग डेढ़ गुना है।

लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी का कहना है कि रिपब्लिकन पार्टी की ये दलील पाखंड से भरी हुई है। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि पिछले रिपब्लिकन प्रशासन के समय भी कर्ज सीमा बढ़ाई गई थी। लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी ने कभी आम सरकारी कामकाज में रुकावट डालने का नजरिया नहीं अपनाया। तब उन्होंने कई बार कर्ज सीमा बढ़ाने के रिपब्लिकन प्रस्ताव का समर्थन किया। इसलिए अब रिपब्लिकन पार्टी को भी वैसा ही रुख अपनाना चाहिए।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपना कर रिपब्लिकन पार्टी असल में राष्ट्रपति जो बाइडन के 3.5 ट्रिलियन डॉलर के सॉफ्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज को रोकना चाहती है। धुर दक्षिणपंथी रिपब्लिकन सीनेटरों की समझ है कि अगर बाइडेन प्रशासन अतिरिक्त कर्ज लेने में नाकाम रहेगा, तो वह इतने भारी खर्च वाली परियोजना को आगे नहीं बढ़ा पाएगा। रिपब्लिकन सीनेटर धनी लोगों पर टैक्स बढ़ा कर अतिरिक्त राजस्व जुटाने की बाइडेन प्रशासन की मंशा में भी रुकावट डाल रहे हैं।

जानकारों के मुताबिक इस गतिरोध की भारी कीमत अमेरिकी जनता और विश्व अर्थव्यवस्था को चुकानी होगी। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि आज की वित्तीय विश्व व्यवस्था अमेरिका की घटनाओं से निकटता से जुड़ी हुई है।
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