अमेरिका और चीन दोनों ग्रीन हाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जक हैं। विशेषज्ञों की राय है कि जलवायु परिवर्तन का मुकाबला दुनिया कैसे करती है, इसे तय करने में अमेरिका और चीन के रुख की सबसे बड़ी भूमिका होगी। केरी अमेरिका का जलवायु दूत बनने के बाद दूसरी बार चीन आए हैं। इसी साल स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से पहले आपसी सहमति बनाना उनकी यात्रा का मकसद है।
चीन ने एलान किया है कि उसके यहां ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 2030 तक अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाएगा। उसके बाद उसमें कमी लाई जाएगी। 2060 तक चीन कार्बन न्यूट्रल देश बन जाएगा। यानी तब चीन में कार्बन का उत्सर्जन शून्य हो जाएगा। लेकिन अमेरिका चाहता है कि चीन इस दिशा में और तेजी से कदम उठाए। केरी ने गुरुवार को यहां स्वीकार किया था कि अमेरिका और चीन के संबंध तनावपूर्ण हैं। लेकिन उन्होंने चीनी अधिकारियों से रचनात्मक रुख अपनाने की अपील की।
उधर चीन का कहना है कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के हिसाब से अमेरिका अभी भी सबसे बड़ा उत्सर्जक है। साथ ही अतीत में जलवायु को नुकसान पहुंचाने में धनी देशों की भूमिका ज्यादा रही है। इसलिए इन देशों को जलवायु बचाने के क्रम में भी ज्यादा जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन अमेरिका और दूसरे धनी देश इस सिद्धांत को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस कारण जलवायु वार्ता जहां की तहां ठहरी हुई है।