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तालिबान 2.0: कैसी होगी अफगानिस्तान की सरकार, मंत्रियों के चयन से लेकर विभाग बंटवारे में मुल्ला उमर के बेटे की मुख्य भूमिका

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Sat, 28 Aug 2021 02:55 PM IST

सार

एक के बाद एक धमाकों में गुरुवार को काबुल दहल गया लेकिन इस सबसे बेफिक्र तालिबान अफगानिस्तान में सरकार बनाने की तैयारी में है। तालिबान का संस्थापक रह चुका मुल्ला उमर का बेटा मुल्ला मोहम्मद याकूब सरकार गठन में मुख्य भूमिका निभा रहा है। 
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तालिबान (फाइल) - फोटो : पीटीआई
15 अगस्त को अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान वहां एक समावेशी सरकार बनाने का दावा कर रहा है। भविष्य की सरकार का स्वरूप कैसा होगा इसे तय करने और मंत्रियों के चुयन के लिए तालिबान एक सर्वोच्च नेतृत्व परिषद के गठन की तैयारी में है। माना जा रहा है कि यही नेतृत्व परिषद अफगानिस्तान पर शासन करेगी। हालांकि इसकी संरचना क्या होगी और यह कैसे काम करेगा इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह परिषद अनिश्चित काल के लिए बनेगी या अंतरिम अवधि के लिए। 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक तालिबान का सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर राजधानी काबुल में हैं और मुल्ला मोहम्मद याकूब के साथ मिलकर सरकार गठन की योजना बना रहा है। 30 साल का याकूब वर्तमान में समूह के सैन्य अभियानों का नेता है और सरकार गठन में विशेष भूमिका निभा रहा है। वह प्रमुख मंत्रालयों जैसे आंतरिक सुरक्षा, रक्षा, विदेश मामले, वित्त, सूचना और काबुल के मामलों के लिए खास रणनीति पर काम कर रहा है। मंत्रियों के चयन से लेकर विभागों में बंटवारे में वह खास दिलचस्पी ले रहा है।


इन मंत्रालयों को संभालने के लिए तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के कई शीर्ष के नेताओं के नाम पर विचार चल रहा है। मिली जानकारी के मुताबिक तालिबान भ्रष्टाचार से लड़ने और भ्रष्ट अधिकारियों को सजा देने के लिए स्थानीय स्तर पर विशेष अदालतें स्थापित करने पर विचार कर रहा है। वहीं तालिबान देश में प्रवेश के स्थान से लेकर गंतव्य तक सामान लाने के लिए एकल शुल्क लागू करने की योजना भी बना रहा है।

तालिबान पर भरोसा बिल्कुल नहीं
नाम नहीं लिखे जाने की शर्त पर अफगानिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया तालिबान की बड़ी-बड़ी बातों पर भरोसा बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। विद्रोही लड़ाकों के इस कट्टर शासन में नागरिक स्वतंत्रता को सबसे बड़ा खतरा पहुंचा है और आगे भी पहुंचने वाला है। तालिबान के पास इस बार अधिक राजनीतिक नियंत्रण और जनशक्ति है। साथ ही अफगान बल और अमेरिकी सैनिकों के छोड़े गए हथियार और उपकरण भी बड़ी मात्रा में उसके हाथ लग गए हैं, जिससे तालिबान पहले के मुकाबले खुद को ज्यादा ताकतवर मान रहा है। उस सरकार का कोई मतलब नहीं जिसमें बहुदलीय चुनाव न हों या जिसमें विभिन्न राजनीतिक और जातीय हितधारकों को शामिल नहीं किया जाए।  

बंदूक की नोक पर बनने वाली सरकार होगी
अफगानिस्तान की स्वतंत्र पत्रकार साजिया शोजाई इस सरकार को बंदूक के नोक पर बनने वाली सरकार कहतीं हैं, जो हिंसा और जोर-जबरदस्ती के बल पर अफगानिस्तान में शासन करना चाहते हैं।  उनका कहना है कि निश्चित तौर पर अफगानिस्तान में लोगों की पसंद वाली सरकार नहीं होगी। देश की 98 फीसदी आबादी ऐसी सरकार को नहीं पसंद करेगी, क्योंकि तालिबान के पुराने शासन से हमें बहुत खराब अनुभव रहा है। वे कितना भी कहें कि हम बदल गए हैं लेकिन किसी भी अमन पसंद अफगान नागरिक को उन पर भरोसा नहीं हो सकता। वे बंदूक और हिंसा के दम पर सरकार चलाएंगे और दमनकारी नीति अपनाएंगे।  
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तालिबान (फाइल) - फोटो : पीटीआई
15 अगस्त को अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान वहां एक समावेशी सरकार बनाने का दावा कर रहा है। भविष्य की सरकार का स्वरूप कैसा होगा इसे तय करने और मंत्रियों के चुयन के लिए तालिबान एक सर्वोच्च नेतृत्व परिषद के गठन की तैयारी में है। माना जा रहा है कि यही नेतृत्व परिषद अफगानिस्तान पर शासन करेगी। हालांकि इसकी संरचना क्या होगी और यह कैसे काम करेगा इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह परिषद अनिश्चित काल के लिए बनेगी या अंतरिम अवधि के लिए। 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक तालिबान का सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर राजधानी काबुल में हैं और मुल्ला मोहम्मद याकूब के साथ मिलकर सरकार गठन की योजना बना रहा है। 30 साल का याकूब वर्तमान में समूह के सैन्य अभियानों का नेता है और सरकार गठन में विशेष भूमिका निभा रहा है। वह प्रमुख मंत्रालयों जैसे आंतरिक सुरक्षा, रक्षा, विदेश मामले, वित्त, सूचना और काबुल के मामलों के लिए खास रणनीति पर काम कर रहा है। मंत्रियों के चयन से लेकर विभागों में बंटवारे में वह खास दिलचस्पी ले रहा है।

इन मंत्रालयों को संभालने के लिए तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के कई शीर्ष के नेताओं के नाम पर विचार चल रहा है। मिली जानकारी के मुताबिक तालिबान भ्रष्टाचार से लड़ने और भ्रष्ट अधिकारियों को सजा देने के लिए स्थानीय स्तर पर विशेष अदालतें स्थापित करने पर विचार कर रहा है। वहीं तालिबान देश में प्रवेश के स्थान से लेकर गंतव्य तक सामान लाने के लिए एकल शुल्क लागू करने की योजना भी बना रहा है।

तालिबान पर भरोसा बिल्कुल नहीं
नाम नहीं लिखे जाने की शर्त पर अफगानिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया तालिबान की बड़ी-बड़ी बातों पर भरोसा बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। विद्रोही लड़ाकों के इस कट्टर शासन में नागरिक स्वतंत्रता को सबसे बड़ा खतरा पहुंचा है और आगे भी पहुंचने वाला है। तालिबान के पास इस बार अधिक राजनीतिक नियंत्रण और जनशक्ति है। साथ ही अफगान बल और अमेरिकी सैनिकों के छोड़े गए हथियार और उपकरण भी बड़ी मात्रा में उसके हाथ लग गए हैं, जिससे तालिबान पहले के मुकाबले खुद को ज्यादा ताकतवर मान रहा है। उस सरकार का कोई मतलब नहीं जिसमें बहुदलीय चुनाव न हों या जिसमें विभिन्न राजनीतिक और जातीय हितधारकों को शामिल नहीं किया जाए।  

बंदूक की नोक पर बनने वाली सरकार होगी
अफगानिस्तान की स्वतंत्र पत्रकार साजिया शोजाई इस सरकार को बंदूक के नोक पर बनने वाली सरकार कहतीं हैं, जो हिंसा और जोर-जबरदस्ती के बल पर अफगानिस्तान में शासन करना चाहते हैं।  उनका कहना है कि निश्चित तौर पर अफगानिस्तान में लोगों की पसंद वाली सरकार नहीं होगी। देश की 98 फीसदी आबादी ऐसी सरकार को नहीं पसंद करेगी, क्योंकि तालिबान के पुराने शासन से हमें बहुत खराब अनुभव रहा है। वे कितना भी कहें कि हम बदल गए हैं लेकिन किसी भी अमन पसंद अफगान नागरिक को उन पर भरोसा नहीं हो सकता। वे बंदूक और हिंसा के दम पर सरकार चलाएंगे और दमनकारी नीति अपनाएंगे।  

अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति - फोटो : Social media
महिलाओं का भविष्य क्या
कहा जा रहा है महिलाओं के अधिकारों को लेकर कट्टर सोच रखने वाला तालिबान महिलाओं को विभिन्न सरकारी निकायों में काम करने की अनुमति दे सकता है। तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा था कि समूह "अफगान मानदंडों और इस्लामी मूल्यों के अनुसार" महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करेगा। क्या किसी महिला को सरकार में भी शामिल किया जा सकता है, इस बारे में साजिया शोजाई कहती हैं कि पहली बात तो यह है कि तालिबान किसी भी महिला को अपने सरकार में शामिल ही नहीं करेगा। दूसरी बात यह है कि यदि शामिल भी करता है तो वह बस मिट्टी की मूर्ति की तरह होंगी। महिला मंत्री को कोई अधिकार हासिल नहीं होगा। 

महिलाओं की आजादी खतरे में
उनका कहना है कि तालिबान की सरकार बनने की बात सोचकर ही हम बहुत चिंता में है क्योंकि महिलाओं की आजादी खतरे में पड़ गई है। सब बर्बाद हो रहा है। काबुल शहर में ब्यूटी पार्लर में महिलाओं के चेहरे पोत दिए गए हैं। महिला कलाकारों ने कहा कि हमारी जिंदगी खत्म हो रही है। मेरे रिश्तेदारों और दोस्तों ने बताया कि हमें पारंपरिक कपड़े पहनने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। महिलाओं को अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि तालिबान के पहले शासन में महिलाओं को काम करने, अपनी पसंद के कपड़े पहनने या यहां तक कि घर से अकेले निकलने की आजादी पर भी पाबंदी रही है।

सभी जातियों को शामिल करने की योजना
बताया जाता रहा है कि तालिबान की योजना सरकार में सभी जातियों और आदिवासी पृष्ठभूमि के नेताओं को शामिल करने की है। हालांकि इसे लेकर दुनिया भर में संशय है क्योंकि अफगानिस्तान के हजारा समुदाय के खिलाफ तालिबान की ज्यादतियों की खबरें अक्सर सुनी गई हैं। मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि जुलाई की शुरुआत में गजनी प्रांत में तालिबान ने हजारा अल्पसंख्यक के कई सदस्यों का "नरसंहार" किया है और क्रूरता से उन्हें प्रताड़ित किया। एमनेस्टी ने कहा कि यह घटना तालिबान शासन का 'भयावह संकेत'  है। 

तीसरा सबसे बड़ा जातीय समूह हजारा
हजारा समुदाय अफगानिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा जातीय समूह है। वे मुख्य रूप से शिया मुसलमान हैं। सुन्नी-बहुल अफगानिस्तान में शिया अल्पसंख्यक खूब सताए जाते हैं और उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अफगानिस्तान मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है यदि तालिबान ने अपनी सरकार में देश के सभी जातीय समूहों को साथ नहीं लिया है, तो पिछले चार दशकों से अफगानिस्तान को तबाह करने वाली हिंसा और अस्थिरता निस्संदेह जारी रहेगी। 

तालिबान - फोटो : PTI
अंतर्राष्ट्रीय सरोकार: आतंकवाद और मानवाधिकार
अंतरराष्ट्रीय जगत की सबसे बड़ी चिंता अफगानिस्तान में आतंकवादी नेटवर्क की मौजूदगी को लेकर है। रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) का मानना है कि तालिबान का राजनीतिक उत्थान आतंकवाद विरोधियों के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे विश्व स्तर के आतंकवादी समूह तालिबान के नेतृत्व वाले अफगानिस्तान में अपनी गतिविधियों को बढ़ा सकते हैं।

इसकी बड़ी वजह यह है कि इसके लिए तालिबान उन्हें अनुकूल वातावरण दे सकता है। जबकि तालिबान ने अमेरिका के साथ अपने समझौते में अल-कायदा के साथ संबंध तोड़ने का वादा किया था। लेकिन जिस तरह तालिबान की जीत पर अल-कायदा ने उसकी प्रशंसा की है, उससे तो ऐसा नहीं लगता कि तालिबान इस आंतकी समूह से अपना नाता तोड़ेगा। 

गुरमीत सिंह कहते हैं दूसरी बात यह है कि  जिस तरह आईएस-के ने गुरुवार को काबुल में सीरियल धमाके किए उससे यह भी लगता है कि तालिबान के दुश्मन आतंकी संगठन भी अब उसके खिलाफ खड़े होंगे, जिससे अफगानिस्तान में खून-खराबा बढ़ेगा। जिसका सबसे ज्यादा नुकसान अफगान नागरिकों, महिलाओं और बच्चों को होगा। चूंकि तालिबान का इस्लामी व्यवस्था पर बना शासन एक उदार लोकतंत्र की अवधारणा के विपरीत है। इसलिए दुनिया भर की नजर इस बात पर होगी कि तालिबान मानवाधिकारों और आतंकवादी नेटवर्क के मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ कैसे बातचीत करेगा। 

पाकिस्तान के लिए इस सरकार का क्या मतलब ?
पूर्व विदेश सचिव शशांक का मानना है कि दो दशकों में पहली बार, साफ तौर पर काबुल में एक ऐसी सरकार होगी जिसे पाकिस्तान का समर्थन हासिल होगा। जो अफगानिस्तान के माध्यम से भारत के लिए एक खतरा पैदा कर सकता है। दुनिया तालिबान की जीत को पाकिस्तान की जीत के रूप में देख रही है, क्योंकि यह इस्लामाबाद की लंबे समय से चली आ रही अफगान नीति रही थी, जिसकी पुष्टि हो गई है। पाकिस्तान तालिबान के प्रति अधिक सहानुभूति रखता है और आगे पूरा हर तरह से सहयोग करेगा इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक तालिबान लड़ाकों को अब पाकिस्तान में कुछ लोग नायक के रूप में मान रहे हैं। अब तालिबान अफगानिस्तान को पाकिस्तान के साथ जोड़ने वाली कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर काम करने को तैयार होगा। पाकिस्तान के रूढ़िवादी इस्लामी विद्वान और धार्मिक चरमपंथी तालिबान में "अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात" के निर्माण की घोषणा से विशेष रूप से उत्साहित होंगे। तालिबान शासन का अंतिम स्वरूप जो भी हो,  उसे पाकिस्तान से वैचारिक प्रेरणा मिलेगी। इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान के धार्मिक संस्थानों और राजनीतिक दलों के माध्यम से देश का तालिबानीकरण हो सकता है। 
 
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