स्वेज नहर दुनिया के सबसे व्यस्ततम समुद्री मार्गों में से एक है। पूरी दुनिया में होने वाले समुद्री कारोबार का 12 फीसदी आवागमन इसी नहर से होता है। नहर बनने के बाद एशिया और यूरोप के बीच की दूरी 6000 किलोमीटर कम हो गई है। सफर में भी सात दिनों की कमी आई है। रोजाना यहां से लगभग 50 जहाज गुजरते हैं जिन पर 10 बिलियन डॉलर यानी करीब 73 हजार करोड़ रुपये तक का सामान लदा होता है।
ऐसे रुक गया था यातायात
'एवरगिवन' जहाज चीन से माल लादने के बाद नीदरलैंड के पोर्ट रॉटरडैम जा रहा था। यहां से गुजरने के दौरान तेज और धूलभरी हवा की वजह से जहाज नहर में ही फंस गया। 400 मीटर लंबे इस जहाज में 2 लाख टन से भी ज्यादा का माल लदा था। इस जहाज को 2018 में बनाया गया था, जिसे एवरग्रीन मरीन नामक कंपनी संचालित करती है। जहाज के चालक दल में 25 भारतीय भी शामिल थे। इस जहाज के फंसने से नहर में यातायात पूरी तरह बंद हो गया था और रोजाना करोड़ों का नुकसान हो रहा था। नहर के दोनों छोर पर करीब 150 जहाज फंस गए थे।
1854 में फ्रांस के राजनयिक डि लेसेप्स ने स्वेज नहर को बनाने की योजना पर काम करना शुरू किया था। साल 1858 में एक कंपनी की स्थापना की गई जिसका नाम यूनिवर्सल स्वेज शिप कैनाल कंपनी था। इस कंपनी को 99 साल के लिए नहर के निर्माण और संचालन का काम सौंपा गया। ये नहर 1869 में बनकर तैयार हुई और इसे अंतरराष्ट्रीय यातायात के लिए खोल दिया गया।
1956 में मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। स्वेज नहर कंपनी में ज्यादातर शेयर ब्रिटिश और फ्रांस सरकार के थे। नासिर के इस कदम से दोनों देशों में हड़कंप मच गया। ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल ने मिस्र पर हमला कर दिया। हालांकि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप की वजह से ब्रिटेन और फ्रांस को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। इसके बाद से नहर पर मिस्र का अधिकार है।