हथियारों के लिए चीन पर सिर्फ पाकिस्तान ही निर्भर है। इस्लामाबाद ने बीते पांच सालों में जितने हथियार आयात किए हैं, उनमें से 74 फीसदी हिस्सेदारी चीन की है। रिपोर्ट में कहा गया कि चीन की इस असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण उसकी विदेश नीति है। लड़ाकू विमान बेचने के लिए किसी भी देश को अपनी व्यापार नीति को लचीला बनाने की जरूरत पड़ती है, तकनीक हस्तांतरिक करनी होती है। यह सब हथियारों की डील का हिस्सा होता है, लेकिन चीन ऐसा नहीं होने देता। चीन दुनियाभर में सबसे बड़ा निर्यातक बनना चाहता है, लेकिन वह अपना आयात नहीं बढ़ाना चाहता।
भारत में हथियारों का आयात हुआ कम
इस साल स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि 'आत्मनिर्भर भारत' स्कीम के तहत भारत लगातार खुद पर निर्भरता बढ़ा रहा है। वर्ष 2011-2015 और 2016-20 के बीच भारत के हथियारों के आयात में 33 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। इसी दौरान, चीन का निर्यात भी 7.8 फीसदी गिरा है।
चीन के निर्यात में आई भारी गिरावट
फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर आपके दोस्त नहीं हैं तो ये अत्याधुनिक हथियार और विमान मायने नहीं रखते। यही वजह है कि दुनिया के देश बीजिंग के फाइटर जेट खरीदने से बच रहे हैं।
तकनीक सुधार के बावजूद इन देशों से पीछे है चीन
चीन ने लगातार अपने लड़ाकू विमानों की तकनीक में सुधार कर रहा है। ड्रैगन ने जे-10, जे-10सी और एफसी-31 जैसे लड़ाकू विमान बनाए हैं। सिपरी की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2000 से 2020 के बीच चीन ने 7.2 अरब डॉलर के सैन्य विमान निर्यात किए हैं। वहीं, अमेरिका ने सबसे ज्यादा 99.6 अरब डॉलर के विमान निर्यात किए हैं और इसके बाद दूसरे नंबर पर रूस ने 61.5 अरब डॉलर के विमान दूसरे देशों को दिए हैं। यहां तक कि फ्रांस ने भी चीन से दोगुना कीमत यानी 14.7 अरब डॉलर के विमान निर्यात किए हैं।