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कोरोना वायरस: ‘लॉन्ग कोविड’ को समझने की नई कोशिश में जुटे हैं वैज्ञानिक, ठीक हो चुके लोगों में लगातार बना हुआ है बड़ी समस्या

Fri, 16 Jul 2021 07:50 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन

सार

विशेषज्ञों के मुताबिक लॉन्ग कोविड के तहत सबसे ज्यादा मामले सांस लेने में दिक्कत की आई। लेकिन ऐसे मामले भी आए, जिनके इलाज के लिए हृदय रोग विशेषज्ञ, न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ, त्वचा रोग विशेषज्ञ या ईएनटी (आंख- नाक- गला) विशेषज्ञों की मदद लेनी पड़ी...
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
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विस्तार
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ब्रिटेन और दूसरे देशों में कोरोना संक्रमण के मामलों में फिर से लगातार बढ़ोतरी के बीच वैज्ञानिक अब नई लहर के दीर्घकालिक असर का अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे हैं। कोरोना संक्रमण की पिछली लहरें उस समय आईं, जब ज्यादातर लोगों का टीकाकरण नहीं हुआ था। अब टीकाकरण के बावजूद नई लहर के संकेत मिल रहे हैं।

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वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश में हैं कि इस हाल में जो लोग संक्रमित हो रहे हैं, क्या उनमें भी लॉन्ग कोविड के लक्षण देखने को मिलेंगे। लॉन्ग कोविड पहले से एक बड़ी समस्या बना हुआ है। कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके बहुत से लोगों में लंबे समय तक संक्रमण के कारण पैदा हुई दिक्कतें जारी रही हैं। इसे ही विशेषज्ञों ने लॉन्ग कोविड नाम दिया है।  

ये देखा गया है कि टीका ले चुके लोगों में कोरोना संक्रमण के लक्षण अपेक्षाकृत हल्के रहे हैं। उनके अस्पताल में भर्ती होने या मृत्यु होने की घटनाएं ऐसे मामलों में कम रही हैं। उनमें लॉन्ग कोविड की समस्या किस रूप में देखने को मिलेगी, विशेषज्ञ इसका अनुमान लगा रहे हैं। पहले के दौर में संक्रमित हुए लोगों में देखा गया था कि संक्रमण ठीक होने के 12 हफ्तों बाद तक ऐसे व्यक्ति किसी ना किसी दिक्कत का सामना करते रहे। इन दिक्कतों में सांस लेने में मुश्किल, जोड़ों में दर्द, आंखों के आगे धुंधला छा जाना और थकान शामिल हैं।
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अमेरिका में गैर सरकारी संस्था फेयर हेल्थ ने 20 लाख मरीजों के हेल्थ रिकॉर्ड का अध्ययन एक ताजा रिपोर्ट जारी की है। उसके मुताबिक कोरोना संक्रमित हुए एक चौथाई लोग लॉन्ग कोविड से पीड़ित हुए हैं। 38 फीसदी लोगों में तो ये दिक्कतें 12 हफ्तों के बाद भी जारी रहीं। ब्रिटेन में भी हुए एक अध्ययन से सामने आया कि जो लोग लॉन्ग कोविड से पीड़ित हुए, उनमें एक तिहाई से ज्यादा लोग 12 हफ्तों के बाद भी इसके लक्षणों को झेल रहे थे।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से जुड़े अस्पतालों में लॉन्ग कोविड सेंटर बनाए गए हैं। वहां ऐसे मरीजों का इलाज करने वाले विशेषज्ञ डॉ. टोबी हिलमैन ने लंदन के अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि जिन लोगों के लॉन्ग कोविड का इलाज उनके केंद्रों में किया गया, उनमें ज्यादातर 30 से 60 वर्ष तक उम्र के लोग थे। वे ऐसे लोग थे, जो कोरोना संक्रमित होने के पहले तंदुरुस्त थे। डॉ. हिलमैन ने कहा कि उनके अनुभव से ये धारणा गलत साबित होती है कि लॉन्ग कोविड से सिर्फ बुजुर्ग या पहले से बीमार रहे लोग ही पीड़ित होते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक लॉन्ग कोविड के तहत सबसे ज्यादा मामले सांस लेने में दिक्कत की आई। लेकिन ऐसे मामले भी आए, जिनके इलाज के लिए हृदय रोग विशेषज्ञ, न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ, त्वचा रोग विशेषज्ञ या ईएनटी (आंख- नाक- गला) विशेषज्ञों की मदद लेनी पड़ी।

कुल 56 देशों में लॉन्ग कोविड के 3,700 मामलों के अध्ययन के दौरान देखा गया कि लॉन्ग कोविड का असर दस अंगों पर हुआ, जिनसे संबंधित लगभग 200 लक्षण सामने आए। ये अध्ययन यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन ने किया है। इसकी रिपोर्ट ब्रिटिश मेडिकल जर्नल द लांसेट में छपी है। इस अध्ययन का नेतृत्व न्यूरो-साइंटिस्ट एथेना अकरामी ने किया। उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘दसियों हजार लोग लॉन्ग कोविड को चुपचाप झेल रहे हैं। ऐसे लोग यह तय नहीं कर पाते कि उनमें जो लक्षण दिख रहा है, क्या उसका कोविड-19 से संबंध है। ऐसे तमाम लोगों की जांच करने और उनका इलाज करने की जरूरत है।’

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