सऊदी राज घराने पर मनमाने ढंग से लोगों का सिर कलम करने की सजा देने और समलैंगिक समुदाय का उत्पीड़न करने के आरोप भी हैं। मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ताजा सौदे के बाद कहा- ‘इससे सऊदी अधिकारियों को दुनिया में अपना नाम, अपना ब्रांड और अपने बारे में सकारात्मक संदेश पहुंचाने में मदद मिलेगी।’ इस सौदे के साथ ही यूरोपीय फुटबॉल में पश्चिम एशिया के राज घरानों की पैठ और गहरी हो गई है। गौरतलब है कि इंग्लैंड के क्लब मैनचेस्टर सिटी का स्वामित्व अबू धाबी के शाही परिवार के हाथ में है। उधर फ्रांस के पेरिस सेंट जरमाइन क्लब का स्वामित्व कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड के पास है।
लेकिन सऊदी अरब के क्लब खरीदने को लेकर जितना विवाद हुआ है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा- ‘इस देश में अपनी ही जनता के खिलाफ मानवाधिकारों का सबसे खराब ढंग का, व्यवस्थागत उल्लंघन होता है। वहां स्थिति सुधरने के बजाय बदतर होती जा रही है।’ सऊदी प्रिंस ने ये फुटबॉल क्लब खरीदने के लिए ब्रिटिश व्यापारी अमान्डा स्टेवेली की कंपनी पीसीपी कैपिटल पार्टनर्स के साथ साथ साझा कंपनी बनाई। 40 करोड़ डॉलर में हुई इस खरीदारी में 80 फीसदी धन सऊदी सॉवरेन वेल्थ फंड ने लगाया है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस दांव के पीछे ‘स्पोर्ट्स वॉशिंग’ के अलावा प्रिंस सलमान के दूसरे मकसद भी हैं। लंदन के किंग्स कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर डेविड रॉबर्ट्स ने अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी से कहा- ‘प्रिंस सलमान अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे जानते हैं कि सऊदी अरब के तेल भंडार हमेशा कायम नहीं रहेंगे। सऊदी अरब में बड़े पैमाने पर बदलाव हों, यह अब वहां अस्तित्व से जुड़ा सवाल बन गया है। इसलिए प्रिंस सलमान हर क्षेत्र में नई समझ अपनाना चाहते हैं।’