रूस ने अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार को डॉलर से मुक्त करने के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा है। इस बात की पुष्टि ताजा आंकड़ों से हुई है। इस साल फरवरी और मार्च में अमेरिका सरकार की प्रतिभूतियों (सिक्युरिटीज) में रूस ने अपना निवेश एक अरब डॉलर से भी ज्यादा घटा दिया। इसका अर्थ है कि रूस के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा घट रहा है। फरवरी में 2020 में बैंक ऑफ रशिया के पास 5.756 अरब डॉलर थे। पिछले महीने ये रकम घट कर 3.976 अरब डॉलर रह गई। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि एक दशक पहले अमेरिकी बॉन्ड्स में रूस का निवेश 170 अरब डॉलर से भी ज्यादा का था।
विश्लेषकों के मुताबिक रूस ने डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाने की नीति 2014 में अपनाई। उसी समय अमेरिका ने यूक्रेन मसले पर रूस पर प्रतिबंध लगाए थे। अमेरिका की तरफ से बढ़ते प्रतिबंधों के बीच 2018 से रूस ने डॉलर पर निर्भरता घटाने की नीति में तेजी ला दी। तब उसने अमेरिकी बॉन्ड्स में अपना निवेश घटा कर आधा कर दिया। उससे मुक्त हुई रकम से उसने सोना, यूरो और युवान की खरीदारी की।
पिछले तीन साल में रूस ने अपने विदेशी मुद्रा निवेश में डॉलर का हिस्सा लगातार घटाया है। 2020 की पहली तिमाही में रूस और चीन के बीच जो आयात-निर्यात हुआ, उसमें से आधे से भी कम हिस्से का भुगतान डॉलर के जरिए किया गया। जबकि 2016 तक दोनों देशों के कारोबार में 90 फीसदी हिस्से तक का भुगतान डॉलर में होता था। इस साल फरवरी में रूस ने अपने नेशनल वेल्थ फंड का स्वरूप बदल दिया। उसमें उसने युवान और येन को भी शामिल कर लिया। इसका नतीजा हुआ कि उसके नेशनल वेल्थ फंड में डॉलर और यूरो का साझा हिस्सा कर महज 35 फीसदी रह गया। वेल्थ फंड में ब्रिटिश पाउंड को भी शामिल किया गया है।
फरवरी में ही रूस के विदेश उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने ब्लूमबर्ग बिजनेस न्यूज नेटवर्क को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि डॉलर एक जहरीली मुद्रा बन गई है। उन्होंने कहा कि यह रूस के हित में है कि वह डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाए। उन्होंने कहा- ‘हमारी जरूरत यह है कि हम अमेरिका की वित्तीय और आर्थिक प्रणाली से दूरी बनाएं, ताकि विरोधी कार्रवाइयों के समय इस जहरीले स्रोत पर हमारी निर्भरता ना रहे। हमें हर तरह के कामकाज में डॉलर की भूमिका घटानी होगी।’
जानकार रूस के इस कदम को बेहद अहम मान रहे हैं। चीन भी विश्व व्यापार पर डॉलर के वर्चस्व को घटाने की नीति पर चल रहा है। इस प्रयास में ईरान भी शामिल हुआ है। ये देश अब आपसी कारोबार अपनी मुद्राओं के विनिमय से कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि ये ट्रेंड आगे बढ़ा तो उससे सचमुच डॉलर के मौजूदा रुतबे पर फर्क पड़ सकता है। वित्तीय जानकारों के मुताबिक डॉलर का वर्चस्व दुनिया पर अमेरिका के दबदबे का एक बेहद अहम पहलू है। इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि रूस जैसी कोशिशों से अमेरिका की चिंताएं बढ़ेंगी।