जलवायु परिवर्तन पर यहां चल रहे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (कॉप-26) में अब गरीब देश सीधे धनी देशों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, जंगलों में आग, सूखा, और समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी की समस्याएं गंभीर हो गई हैं। गरीब देशों पर इनकी ज्यादा मार पड़ रही है। इन देशों ने यहां ये मांग जोरदार ढंग से उठाई है कि धनी देश उन्हें हो रहे नुकसान के बदले मुआवजा दें।
गरीब और विकासशील देशों की दलील है कि पश्चिमी देश जलवायु को भारी नुकसान पहुंचाते हुए धनी हुए। उसकी कीमत अब दुनिया में सबको बराबर चुकानी पड़ रही है। इसलिए यह धनी देशों की जिम्मेदारी है कि उनके विकास की वजह से गरीब देशों को जो नुकसान हो रहा है, उसकी वे भरपाई करें।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक सांतियागो नेटवर्क को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि उसे अधिक धन और कर्मचारी मुहैया कराए जाएं। ये कैसे होगा, इस पर ग्लासगो में चर्चा नहीं हुई है। धनी देशों ने अलग से क्षति कोष बनाने या उसके लिए धन मुहैया कराने की बातों से गुरेज ही किया है।
धनी देशों ने यह माना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए गरीब देशों को वित्तीय मदद मिलनी चाहिए। लेकिन जानकारों का कहना है कि इस बारे में किए वादों को उन्होंने नहीं निभाया है। 2009 में उन्होंने 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर देने का वादा किया था। लेकिन उन्होंने ये वादा उन्होंने नहीं निभाया। ग्लासगो सम्मेलन में यह कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए जरूरी नीतियां विकासशील देश अपना सकें, इसके लिए उन्हें हर साल 70 अरब डॉलर की जरूरत होगी। ये लेकिन ये रकम उपलब्ध कैसे होगी, इस पर यहां कोई ठोस बात नहीं की गई है।