पेरू के नए राष्ट्रपति पेड्रो कास्तियो ने एक मार्क्सवादी नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर देश में तनाव को और बढ़ा दिया है। उन्होंने अपने जिस नए मंत्रिमंडल का एलान किया, उनमें वामपंथी नेताओं की भरमार है। इसे इस बात का संकेत माना गया है कि देश के धनी तबके के साथ मेल-मिलाप करने का उनका कोई इरादा नहीं है।
पेरू कोरोना महामारी से बुरी तरह प्रभावित देशों में है। वह उन देशों में है, जहां कोरोना संक्रमण के कारण प्रति व्यक्ति मौतों का अनुपात सबसे ज्यादा है। इस कारण डेढ़ साल से देश संकट में रहा है। हाल के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान वहां तीखा विवाद हुआ। इससे सामाजिक तनाव बढ़ा है। इसे देखते हुए देश और इस क्षेत्र के मीडिया में यह संभावना जताई गई थी कि राष्ट्रपति बनने के बाद पेड्रो कास्तियो सबको साथ लेकर चलने की नीति अपनाएंगे। लेकिन शुक्रवार को जब उन्होंने पहले दिन अपने कार्यालय जाकर महत्वपूर्ण फैसले लिए, तो उससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया है।
कास्तियो एक गरीब किसान के बेटे हैं और जीवन की शुरुआत उन्होंने स्कूल शिक्षक के रूप में की थी। इसके पहले उन्होंने कोई चुनाव नहीं जीता था। लेकिन जून में हुए राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी और कॉरपोरेट समर्थित उम्मीदवार कीको फुजीमोरी को हरा दिया। चुनाव अभियान के दौरान ये देखा गया था कि जहां उनकी उम्मीदवारी से धनी तबके चिंता में थे, वहीं गरीब तबकों में भारी उत्साह था। कास्तियो ने नारा दिया था- ‘इस धनी देश में अब कोई गरीब नहीं रहेगा।’ इससे गरीब तबके उनके समर्थन में लामबंद हुए।
पेरू दुनिया में तांबे का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। इस लिहाज से यह समृद्ध देश है। लेकिन देश असमान विकास का शिकार रहा है। इससे आबादी का बड़ा हिस्सा गरीब है। इस तबके में नया संविधान बनाने और समाजवादी नीतियां लागू करने का कास्तियो का वादा फिलहाल काफी लोकप्रिय है। कास्तियो ने अब क्यूबा में पढ़े गुइदो बेलिदो को प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। बेलिदो मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी फ्री पेरू के नेता हैं। उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति चुनाव में कास्तियो का समर्थन किया था।
प्रधानमंत्री और दूसरे वामपंथी नेताओं की मंत्री के रूप में नियुक्ति से ये संदेश गया है कि कास्तियो सामाजिक बदलाव लाने के अपने वादे के प्रति गंभीर हैं। लेकिन इससे कॉरपोरेट सेक्टर और धनी तबकों को नुकसान होगा। आशंका जताई जा रही है कि ये तबके बगावत पर उतर सकते हैं। उससे देश में टकराव की स्थिति बन सकती है।
फ्री पेरू पार्टी का एजेंडा देश के संसाधनों का राष्ट्रीयकरण रहा है। अगर प्रधानमंत्री बेलिदो इस एजेंडे पर आगे बढ़ते हैं, तो यह टकराव का पहला मुद्दा बन सकता है। उनकी नियुक्ति का एलान होते ही पेरू के मीडिया में इसकी आलोचना की गई। कास्तियो ने विदेश मंत्री एक ऐसे मार्क्सवादी नेता को बनाया है, जो 1990 के दशक में देश में चले गुरिल्ला युद्ध में क्रांतिकारी ताकतों से सहानुभूति रखते थे। कास्तियो को अपने प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल को पहले संसद से मंजूरी दिलानी होगी। पर्यवेक्षकों ने कहा है कि अगर संसद से ऐसा कराने में राष्ट्रपति नाकाम रहे, तो वे संसद भंग कर नया चुनाव करा सकते हैं। पेरू में राष्ट्रपति को संसद भंग करने का संवैधानिक अधिकार है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक निवेशक पहले यह कहते थे कि पेरू में राजनीति भले उथल-पुथल वाली हो, लेकिन अर्थव्यवस्था ठीक ढंग से विकसित होती रहती है। लेकिन अब ये सूरत बदल सकती है। अब राजनीति की उथल-पुथल सीधे अर्थव्यवस्था तक पहुंचने की आशंका मजबूत हो गई है।