प्रधानमंत्री इमरान खान ने ये साफ तौर पर नहीं कहा कि लेफ्टिनेंट जनरल असीम सलीम बाजवा को उनके कार्यकाल के बीच में ही क्यों हटाया जा रहा है। सीपीईसीए के प्रमुख पद पर अगली नियुक्ति का एलान भी अभी नहीं किया गया है। खालिद मंसूर व्यापारी हैं और सीपीईसी से जुड़ी परियोजनाओं से संबंधित रहे हैं। चीनी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों से वे लगातार संपर्क में रहे हैं। इस कारण समझा जाता है कि चीनी अधिकारियों की चिंताओं को दूर करने की वे बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन उन्हें सीपीईसीए का प्रमुख नहीं बनाया गया है।
पाकिस्तानी मीडिया की खबरों के मुताबिक ले.ज.बाजवा पर भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। विपक्षी दल उन पर और उनके परिजनों पर लगे आरोपों की न्यायिक जांच कराने की मांग पर अभी भी अडिग हैं। लेकिन पर्यवेक्षकों की राय है कि इस मौके पर बाजवा को चीन के कहने पर हटाया गया है। चीन न सिर्फ सुरक्षा के मुद्दों को लेकर, बल्कि सीपीईसी परियोजनाओं पर प्रगति की धीमी रफ्तार से भी चिंतित रहा है। पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि बाजवा को हटाने की घोषणा से कुछ दिन पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री मकदूम शाह महमूद कुरैशी और खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख फैज हमीद ने बीजिंग की यात्रा की थी। दोनों वहां ये भरोसा देने गए थे कि पाकिस्तान की सेना सीपीईसी परियोजनाओं को पूरी सुरक्षा मुहैया कराएगी।
पिछले साल सीपीईसीए का गठन हुआ था। उसका मकसद परियोजना की गति बढ़ाना था। इस प्राधिकरण को सीपीईसी परियोजना संबंधी व्यापक अधिकार दिए गए। लेकिन आरोप है कि बाजवा उन्हें दी गई जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पाए। पाकिस्तान के पूर्व नियोजन मंत्री और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के महासचिव अहसान इकबाल ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा कि सीपीईसीए का गठन ही समस्याग्रस्त था। फिर उसके प्रमुख पद पर किसी ऐसे राजनीतिक व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए थी, जो टेक्नोलॉजी में माहिर हो।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक प्रगति की धीमी रफ्तार और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण चीन नाराज हुआ। अब उसे खुश करने के लिए इमरान खान सरकार ने कदम उठाए हैं। इससे ये जाहिर हुआ है कि पाकिस्तान के अंदरूनी फैसले भी अब चीन की मर्जी से तय हो रहे हैं।