इमरान खान कैसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तालिबान से फिर से शांति वार्ता शुरू करने के लिए मनाना चाहते हैं, इसके लिए वे तमाम दलीलें दे रहे हैं। इमरान खान का कहना है कि तालिबान अब 2001 वाला खूंखार नहीं रहा है, अब वह बदल गया है। इमरान खान तालिबान के हिमायती बन कर उनके प्रवक्ता की तरह यह भी कह रहे हैं कि तालिबान पहले की तरह और मिलनसार हो जाएगा। लेकिन ट्रंप इन घटनाक्रमों को किसी और ही नजरिये से देख रहे हैं।
पिछले दिनों न्यूयार्क में काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशन में बोलते हुए इमरान खान ने कहा कि तालिबान अब 19 साल पहले की तरह नहीं रहा है, तालिबान अब केवल अमेरिका के एक कदम आगे बढ़ाने का इंतजार कर रहा है और उनका दावा है कि ऐसा करते ही चीजें बदल जाएंगी। लेकिन तालिबान की हिमायत कर रहे इमरान खान शायद भूल गए हैं कि अफगानिस्तान में खून-खराबा मचाने वाला तालिबान अचानक इतना ‘शरीफ’ कैसे हो गया। ये बात सभी के लिए चौंकाने वाली है कि तालिबान बातचीत के लिए इतना बेकरार क्यों है?
शायद इमरान खान भूल गए हैं कि तालिबान को जन्म देने वाला देश पाकिस्तान ही है, जिसने कभी 1998 में तकरीबन 90 फीसदी अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लिया था। उत्तरी पाकिस्तान में पैदा हुए तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान को सबसे खतरनाक चरमपंथी माना जाता है। इसी संगठन ने ही कभी नोबल पुरस्कार से सम्मानित मलाला यूसुफजई की हत्या करने का आदेश दिया था। यह भी कहा जाता है कि पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या में भी इसी तालिबानी संगठन का हाथ था।
वहीं सोचने वाली बात यह है कि आखिरकार शांति वार्ता के दौरान संघर्ष विराम होने के बावजूद नाटो और अफगान सैनिकों पर ताबड़तोड़ हमले करने वाला तालिबान अचानक से बातचीत के लिए रूस से पैरवी क्यों लगवाना चाहता है। वहीं 9/11 को काबुल में हुए आत्मघाती हमले में एक अमेरिकी समेत 12 लोगों के मारे जाने के बाद ट्रंप ने वार्ता क्यों तोड़ दी। जबकि शुरुआत अमेरिका की तरफ से ही हुई थी।
असल में इमरान खान की यह दलील काफी हद तक ठीक हैं कि तालिबान अब 2001 वाला क्रूर तालिबान नहीं रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि तालिबानी चरमपंथियों ने अफगानिस्तान के तकरीबन 70 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर लिया है। इस बात में कितनी सच्चाई है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अगर आज तालिबानी एकजुट होते तो आज पूरे अफगान में तालिबान का ही कब्जा होता। यही शायद ट्रंप के वार्ता से हाथ खींच लेने की बड़ी वजह है।
1996 से 2001 तक अफगानिस्तान पर शासन कर चुके तालिबान से छिड़े युद्ध में अभी तक नाटो के साढ़े तीन हजार लोगों की लोगों की जान जा चुकी है, इनमें 2,600 अमेरिकी सैनिक हैं। 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि वहां 32 हजार से ज़्यादा आम नागिरकों की मौत हुई है। वहीं अमेरिका इस युद्ध में अरबों-खरबों डॉलर खर्च कर चुका है। साथ ही मौजूदा अफगान सरकार में भ्रष्टाचार जोरों पर है और इसका फायदा तालिबानियों को मिल रहा है।
इसके अलावा तालिबान में भी अब फूट पड़ चुकी है, कभी तालिबान पर अहम प्रभाव रखने वाले वाले क्वेटा शूरा और पाकिस्तान के समर्थन वाला हक्कानी नेटवर्क दोनों अलग हो चुके हैं। प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का महसूद धड़ा तालिबान पर गैर-इस्लामिक तौर तरीके इस्तेमाल करने का आरोप लगा कर पहले ही अलग हो चुका है। महसूद गुट का आरोप है तालिबान चोरी और फिरौती के लिए अपहरण करने वाला आपराधिक संगठन बन गया है। वहीं उन्होंने अपना नया गुट तरहीक तालिबान दक्षिण वजीरीस्तान बनाने का भी एलान कर दिया। इससे पहले 2009 में भी बैतुल्लाह महसूद के ड्रोन हमले में मारे जाने के बाद टीटीपी में आंतरिक कलह सामने आई थी।
वहीं एक और खतरे वाले बात यह है कि इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान वहां बड़ी ताकत के तौर पर उभर रहा है। इस संगठन को आइएसआइएस की दक्षिण एशियाई शाखा, आइएसआइएल खुरासान, इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत और साउथ एशिया चैप्टर ऑफ आइएसआइएल समेत कई नामों से भी जाना जाता है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के एक पूर्व नेता ने 2015 में इस्लामिक स्टेट खुरासान का गठन किया था, जिसके बाद इसमें अल कायदा समेत दूसरे संगठनों के बचे-खुचे आतंकी भी शामिल हो गए थे।
हालांकि तालिबान की तुलना में खुरासान (आईएस-के) अभी छोटा है, लेकिन पकड़ मजबूत होती जा रही है। जिसके चलते तालिबान अमेरिका से बातचीत के लिए उतावला है। वहीं राष्ट्रपति ट्रंप को भी सच्चाई समझ में आ गई है। उन्हें दिख गया है कि तालिबान से शांति वार्ता करके कुछ हासिल नहीं होने वाला है। अगर ट्रंप वहां से चरणों में सेना वापस बुला भी लेते हैं, तो तालिबान और आईएस-के में संघर्ष बढ़ सकता है, जो अशरफ गनी सरकार के लिए खतरा हो सकता है। वहीं तालिबान में बिखराव भी ट्रंप को अखर रहा है।
मौजूदा हालात स्पष्ट करते हैं कि अफगानिस्तान में अभी अनिश्चितता के स्थिति है। आईएस-के ने अफगानिस्तान के पांच प्रांतों हेलमंद, जाबुल, फराह, लोगार और नंगरहार में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। कभी इन इलाकों में तालिबान का कब्जा होता था। आईएस-के न केवल पाकिस्तान बल्कि रूस और चीन को भी बढ़ता खतरा दिखाई दे रहा है। आईएस-के उत्तरी अफगानिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, ताकि मध्य एशिया, चेचन और चीनी वीगर आतंकियों को अपने संगठन से जोड़ सके।
इस साल अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव भी होने हैं और 28 सितंबर को चुनाव प्रचार का आखिरी दिन है। आईएस-के और तालिबान दोनों ही नहीं चाहते कि वहां राष्ट्रपति चुनाव हों। कथित तौर पर तालिबान पहले ही लोगों से वोट न देने की चेतावनी जारी करते हुए अंजाम भुगतने की बात धमकी दे चुका है। तालिबान नहीं चाहता कि शांति वार्ता फिर शुरू होने पहले वहां राष्ट्रपति चुनाव हों और उसकी भागीदारी शून्य हो।
इसलिए वह चुनाव टालने की कोशिशों में जुटा हुआ। पिछले दिनों चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रपति अशरफ गनी को निशाना बना कर एक हमला भी किया गया था, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई थी, वहीं गुरुवार को भी कंधार में गनी के चुनाव कार्यालय में हमला किया गया, गनी पर यह दूसरा हमला है।
पाकिस्तान को भी लग रहा है कि आईएस-के अगर मजबूत हुआ तो खतरा वहां तक पहुंच सकता है। इसकी वजह है कि पाकिस्तान और आसपास के मुस्लिम देशों से कई युवा आईएस में शामिल हुए थे। इसके अलावा आईएस या आईएस समर्थन वाले संगठनों के हमले पाकिस्तान में भी हुए हैं। पाकिस्तान को यह भी डर है कि कहीं ऐसा न हो कि शिया विरोध की राजनीति करने वाले पाकिस्तान के कट्टरपंथी संगठन आईएस-के को अपना समर्थन न दे दें।